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देवकांता संतति भाग 7

वेद प्रकाश शर्मा

प्रकाशक : तुलसी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1997
पृष्ठ :348
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 2050
आईएसबीएन :0000000

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चंद्रकांता संतति के आधार पर लिखा गया विकास विजय सीरीज का उपन्यास...

 

तीसरा बयान


आज मैं ये कागज कोई दस दिन बाद लिखने बैठा हूं। इस बीच मेरे साथ कई ऐसी घटनाएं गुजरी हैं, जो जरूरी होने के साथ-साथ दिलचस्प और उत्सुकता पैदा कर देने वाली हैं। कदाचित् कलमदान में रखने के लिए मैं ये आखिरी कागज लिख रहा हूं। इसे पढ़कर आपको बहुतसी जानकारियां हासिल होंगी। अगर मैं उन सारी घटनाओं को मुख्तसर में लिखूं तो इतने कागज भर जाएंगे कि कलमदान में आ नहीं सकेंगे। इसी सबब से अपना आगे का हाल मैं संक्षेप में लिख रहा हूं। मैं केवल वे ही बातें लिखूंगा, जिनकी जरूरत है और इन दोनों दुष्टों के गुनाहों को साफ करने में काम आएंगी। मैं ये फैसला कर चुका हूं कि वह कलमदान किसको देना है। खैर.. ये सब बातें बाद की हैं-अब आप हाल पढ़िए--

उस रात के बाद अगले दिन मैंने दारोगा के उस खास प्यादे को पकड़ लिया जो हमेशा दारोगा के कमरे के बाहर तैनात रहता था। उसे मैंने किस तरीके से अपने कब्जे में करके काम निकाला, यह तो मैं यहां लिखूंगा नहीं, क्योंकि पहले ही कह चुका हूं कि मैं यहां मोटी-मोटी बातें लिखूंगा। हां, इतना लिख सकता हूं कि इस प्यादे को मैंने उस वक्त पकड़ा, जब यह दोपहर का खाना खाने अपने घर पर पहुंचा। अपने घर पर वह अकेला ही रहता था, इस सबब से उस पर कब्जा करने में मुझे किसी खास परेशानी का सामना न करना पड़ा। उसे बेहोश करके मैं पहले उसे जंगल में यहां ले आया, जहां आजकल मैं रहता हूं। यहां इस प्यादे को जान से मारकर अपने दिल को यह शांति पहुंचाई कि अपने मालिक (उमादत्त) के एक गद्दार को मैंने खत्म कर दिया। उसकी लाश जंगल में ही एक जगह दबाने के बाद मैंने खुद उस प्यादे का भेस बनाया और दारोगा के मकान पर पहुंच गया। किसी को मुझ पर शक न हुआ और मैं उसकी जगह तैनात हो गया।

अब मैं चौबीस घन्टे दारोगा के कमरे के बाहर ही तैनात रहने लगा। पहली रात को दारोगा, बलवंत और विक्रमसिंह की बातें सुनी उनके बीच इस तरह की कोई खास बात नहीं हुई जिसे मैं यहां लिखने की आवश्यकता समझूं। ज्यादातर उनकी बातें मेरे ही बारे में थीं। वे अपने जी-जान से मुझे तलाश कर रहे थे, किन्तु मैं आराम से खड़ा उनकी बातें सुना करता था। रात को दारोगा के पास आकर सब दिन-भर की अपनी-अपनी डींग हांका करते थे, मगर जब दारोगा यह पूछता कि-'बंसीलाल मिला या नहीं?' तो सामने वाले के चेहरे पर मातम छा जाता था।

हर रोज का यही किस्सा था।

ऐसी कोई नई बात वहां नहीं हुई, जिसका सार अपने कागजों में पीछे कहीं न लिख आया होऊं। दारोगा सारे दिन अपने कमरे में ही बंद रहता। वह बहुत ही दुखी और परेशान था। इस आलम में वह चौबीस घण्टों में एक ही बार खाना खा पाता था।

मैं उसकी हालत देखकर मन-ही-मन खुश हुआ करता था।

उधर!

पांच दिन की लगातार तलाश के बावजूद उमादत्त के आदमियों को कंचन और कमला की लाशें न मिलीं। पांचवें दिन अपने पक्ष के सात सिपाही और मुझे लेकर दारोगा चमनगढ़ से बाहर जंगल में निकला। सारे दिन वह जंगल में इधर-उधर तलाश करने का स्वांग रचाता रहा। शाम को वह खूनी घाटी के पास पहुंच गया। उसने अपने साथियों से कहा-''क्यों न खूनी घाटी में भी तलाश कर लें?''

''अजी वहां भला कहां होगी दारोगा साहब?'' एक सिपाही ने कहा-'उसमें तो कोई जाता ही नहीं है।''

''लेकिन तलाश करने में हर्ज क्या है?'' दारोगा ने कहा। मतलब ये कि कई सैनिकों ने अलग-अलग ढंग से यह कहा कि खूनी घाटी में जाना समय बर्बाद करना है। लेकिन दारोगा भला उनकी बात कैसे मान जाता? यह तो केवल मुझे ही मालूम था कि इस दुष्ट को पता है कि लाशें खूनी घाटी में ही मौजूद हैं। दारोगा के सामने भला किसकी चलनी थी? किसी की एक न चली और दारोगा हम सबको साथ लेकर खूनी घाटी में दाखिल हो गया। कुछ देर तक वह घाटी में इधर-उधर भटककर तलाश करने का स्वांग रचाता रहा और अंत में वह सबको घेर-घारकर लाशों के पास ले गया था।

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