Vivah Divasotsav Kaise Manayein - Hindi book by - Sriram Sharma Acharya - विवाह दिवसोत्सव कैसे मनाएँ - श्रीराम शर्मा आचार्य
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विवाह दिवसोत्सव कैसे मनाएँ

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :24
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15535
आईएसबीएन :0

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विवाह दिवसोत्सव कैसे मनाएँ

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विकृतियों का समाधान


आज हमारा सारा समाज अगणित उलझनों और समस्याओं से घिरा, व्यथा वेदनाओं से, क्लेश-कलह से दुःख-दारिद्र से संत्रस्त हो रहा है। इसका कारण हमारे गृहस्थ जीवनों में दाम्पत्य सम्बन्धों में फैल रही विकृतियाँ ही हैं। ऐसे सौभाग्यशाली गृहस्थ बहुत कम ही मिलेंगे, जिनमें पति-पत्नी दूध, पानी की तरह एक होकर रहे हो अपना आपा दूसरे में घुला चुके हो दो मिलकर एक हो चुके हो जिनमें तनिक भी दुःख, अविश्वास या सन्देह न हो, जिनमें दोनों की इच्छायें-आकांक्षायें मिल कर एक हो गई हो जिनने जीवन के कर्तव्य और उत्तरदायित्वों का भार समान रूप से उसी तरह अपने कंधों पर लाद लिया हो जैसे दो बैल एक जुए को कंधों पर रखकर बहन करते हैं।

आज तो इससे सर्वथा विपरीत स्थिति है। लोक-लज्जा बच्चों का मोह, गृह व्यवस्था, वासना आदि के कच्चे धागों से परस्पर किसी प्रकार बंधे तो हुए है, पर मन जिनके सर्वथा विपरीत है। एक-दूसरे के प्रति असीम घृणा और अविस्वास भरे हुए हैं। मजबूरियों ने उन्हें जोड़ तो रखा है, पर मन एक-दूसरे से फटे दूध की तरह बिलग-बिलग बने हुए हैं। सांसारिक व्यवस्था तो एक को दूसरे की रखनी पड़ती है, पर मन में वह भावना नहीं, जिससे एक को देख दूसरा जिये-जैसी स्थिति का अनुभव हो। मनों में भरा हुआ यह दुर्भाव सन्तान के मनःक्षेत्र का विकृत सृजन करता है। पति-पत्नी के शरीरों में मिल कर बच्चे का शरीर बनता है और मनों से मिलकर मन। माता-पिता का जैसा रंग-रूप, कद, कलेवर, ढांचा तथा स्वास्थ्य होगा, उसी से मिलता-जुलता बच्चों का भी होता है। ठीक इसी प्रकार पति-पत्नी के बीच जैसे सम्बन्ध, जैसे मनोभाव चल रहे होंगे, उसी भली या बुरी स्थिति के अनुरूप बालक का मनःक्षेत्र विनिर्मित होगा। परस्पर द्वेष, दुर्भाव रखने वाले पति-पत्नी केवल क्रोधी, उद्‌दण्ड उड़ेल, ईष्यालु, द्वेषी, स्वार्थी एवं निकृष्ट धरातल के मनक्षेत्र वाले बालकों को ही जन्म दे सकते है।

छोटे बच्चे अत्यधिक सवेदनशील होते है। गर्भ से लेकर पाँच वर्ष की आयु तक वे अपनी मनोभूमि का ढाँचा खड़ा कर लेते है। इसके बाद तो स्कूली और कामकाजी पढ़ाई हो शेष रह जाती है। माता-पिता द्वारा घर का सूक्ष वातावरण जैसा भी कुछ बना रखा गया है उसी के अनुरूप भाव तरगें बालकों के कोमल अन्त-करण पर स्वयमेव जमती चली जाती है। उनके व्यक्तित्व का तीन-चौथाई निर्माण इसी स्थिति में हो जाता है। बड़े होकर बे वैसे ही बनते है। आज नई पीढ़ी में हमें जो दोष-दुर्गुण दिखाई पड़ते हैं इसका अधिकांश दोष उनके माता-पिता का हे। यदि वे ठीक तरह अपने दाम्पत्य-प्रेम को सुरक्षित रख सके होते और दैनिक जीवन में सद्‌भावनाओं का उल्लास भरा वातावरण बनाये रख सके होते तो निश्चय ही उन घरों में महापुरुष, नर-रत्नों की फसल उपजी होती।

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    अनुक्रम

  1. विवाह प्रगति में सहायक
  2. नये समाज का नया निर्माण
  3. विकृतियों का समाधान
  4. क्षोभ को उल्लास में बदलें
  5. विवाह संस्कार की महत्ता
  6. मंगल पर्व की जयन्ती
  7. परम्परा प्रचलन
  8. संकोच अनावश्यक
  9. संगठित प्रयास की आवश्यकता
  10. पाँच विशेष कृत्य
  11. ग्रन्थि बन्धन
  12. पाणिग्रहण
  13. सप्तपदी
  14. सुमंगली
  15. व्रत धारण की आवश्यकता
  16. यह तथ्य ध्यान में रखें
  17. नया उल्लास, नया आरम्भ

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