महाकाल का सन्देश - श्रीराम शर्मा आचार्य Mahakal Ka Sandesh - Hindi book by - Sriram Sharma Acharya
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आचार्य श्रीराम शर्मा >> महाकाल का सन्देश

महाकाल का सन्देश

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :60
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15498
आईएसबीएन :00000

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पूज्य गुरुदेव के प्रखर और सशक्त विचारों का संकलन

Mahakal Ka Sandesh : Jagrut Atmaon Ke Naam - Sriram Sharma 

प्रतिभाओं से....

युग परिवर्तन जैसे बड़े कार्यों के उत्तरदायित्व और भार सामर्थ्य-सम्पन्न लोग ही सँभाल सकते हैं। युग निर्माण योजना की विचारधारा और क्रियापद्धति विभूति संपन्न लोगों तक पहुँचाई जानी चाहिए। खोज-खोज कर उन्हें प्रभावित किया जाना चाहिए। तथ्यों का प्रस्तुतीकरण ठीक ढंग से किया जाए, तो महाकाल का आह्वान वह भली प्रकार समझ सकते हैं और अपना समर्थ योगदान देकर कार्य की प्रगति में कई गुनी गति ला सकते हैं।

इसी उद्देश्य से इस पुस्तिका में पूज्य गुरुदेव के ऐसे प्रखर और सशक्त विचार संकलित किए गये हैं, जिनका अध्ययन, चिंतन, मनन यदि एकाग्रता और पूर्ण मनोयोग से किया जाए, तो युगधर्म के परिपालन के लिए एक सुनिश्चित प्रेरणा एवं क्रियापद्धति प्राप्त हो जाएगी।

- प्रकाशक

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अब शिथिलता, उपेक्षा, आलस्य और अवसाद का दौर हमें समाप्त कर देना चाहिए। जिन्हें जागना है, उन्हें जग ही जाना चाहिए। जिन्हें आत्म-विस्मरण ने आ घेरा है, उन्हें अपना स्वरूप, लक्ष्य एवं कर्त्तव्य समझने के लिए अपने को झकझोरना चाहिए और दर्पण में देखना चाहिए कि आखिर हम क्या हैं? आये किसलिए हैं? परिवर्तन की वेला आ पहुँची है। युग परिवर्तन का महान् प्रयोजन प्रबुद्ध आत्माओं के आत्मपरिवर्तन से आरंभ होगा। हम बदलेंगे तो जमाना बदलेगा।

(अखंड ज्योति-१९६८, नवं० ६४)

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समय की कसौटी इन्हीं दिनों खरे-खोटे की परीक्षा करने के लिए हठपूर्वक आ खड़ी हुई है। इसे झुठलाया नहीं जा सकता। देखना यह है कि इस आड़े समय में हनुमान् का पौरुष कहीं से हुंकार भरता है या नहीं? यहाँ यह नहीं कहा जा रहा है कि सभी निष्क्रिय हो गये हैं। सक्रियता पर्याप्त मात्रा में अभी भी है। कार्य की व्यापकता को देखते हुए अब सक्रियता का अनुपात एवं स्तर बढ़ाने के लिए कहा जा रहा है। विशेष रूप से यह उद्बोधन हर उस व्यक्ति के लिए है, जो स्वयं को हनुमान् के रूप में लाना चाहे।

(वाङ्मय-२८, पृ० ६.२९)

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उपदेश इन दिनों प्रायः सर्वथा असफल इसी कारण हो रहे हैं कि उपदेशक जो दूसरे से कराना चाहते हैं, उसे निजी जीवन में समाविष्ट करके यह सिद्ध नहीं कर पाते कि जो कहा गया है, वह व्यावहारिक भी है। यदि उचित, व्यावहारिक और लाभप्रद रहा होता तो उपदेशों के अनुरूप प्रवक्ता ने सर्वप्रथम उस विधा को अपनाकर अपने को लाभान्वित किया होता। इस संदेह, असमंजस का निराकरण न कर पाने पर ही उपदेशकों के द्वारा बार-बार दिये जाने वाले भाषण भी जाग्रत् आत्माओं के नाम विडम्बना बनकर रह जाते हैं, श्रवणकर्ताओं के गले नहीं उतरते। वस्तुत: आचारनिष्ठ उपदेशक ही परिवर्तन लाने में सफल हो सकते हैं।

(वाङ्मय-२८, पृ० ८.९)

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हमारी कड़ी हिदायत यह है कि आर्थिक या नैतिक छिद्र अपनी (युग निर्माण मिशन गायत्री परिवार) प्रक्रिया में कहीं न बनने पाये, अन्यथा प्रामाणिकता पर ऊँगली उठने लगने पर वह तेजस्विता समाप्त हो जाएगी, जिसके आधार पर असंभव समझे जाने वाले कार्य संपन्न होने जा रहे हैं। हमारे आंदोलन की सफलता और मिशन की प्रगति का क्रम तभी तक तूफानी गति से चल सकेगा, जब तक उसकी पवित्रता और प्रामाणिकता हर कसौटी पर खरी सिद्ध होती रहेगी। संगठन की मूलभूत शक्ति-सामर्थ्य में कहीं कोई छिद्र बन सके, ऐसा नहीं होने दिया जाए।

(अखण्ड ज्योति-१९८८, दिसम्बर)

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जिनका विवेक जग सके, वे समय को पहचाने, अपनी गरिमा और भूमिका समझें और बाल क्रीड़ाओं में ही उलझे न रहें। वरिष्ठों और विशिष्टों की कोई महत्त्वपूर्ण भूमिका इस आपत्तिकाल में भी न बन सकी, तो इतना ही कहा जाएगा कि भावनाओं के पंख कट गये और वह मात्र कल्पना के पिंजड़े में तड़फड़ाती हुई दम तोड़ गईं। नफे-नुकसान का बहीखाता फैलाने का यह समय नहीं है। इन दिनों तो शूरवीरों की तरह सिर हथेली पर रखकर धर्मयुद्ध में कूद पड़ने में ही हमारे वर्चस्व की सार्थकता है। समय बिना किसी की प्रतीक्षा किये चला जाएगा। उसे इस बात की परवाह नहीं कि कौन दूरदर्शिता का परिचय देता है, कौन व्यामोह के चक्रव्यूह में फँसा रहता है?

(महाकाल की आकांक्षा-३१)

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जीवन का हर क्षण एक उज्ज्वल भविष्य की संभावना लेकर आता है। हर घड़ी एक महान् मोड़ का समय हो सकती है। मनुष्य यह निश्चयपूर्वक नहीं कह सकता है कि जिस समय, जस क्षण और जिस पल को वह यों ही व्यर्थ में खो रहा है, वह ही क्षणवह ही समय उसके भाग्योदय का समय नहीं है? क्या पता जिस क्षण को हम व्यर्थ समझकर बरबाद कर रहे हैं, वह ही हमारे लिए अपनी झोली मं  सुन्दर सौभाग्य की सफलता लाया हो।

(अखण्ड ज्योति-१९६६, अगस्त-१९)

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केवल विचार मात्र ही मानव चरित्र के प्रकाशक प्रतीक नहीं होते। मनुष्य का चरित्र विचार और आचार दोनों से मिलकर बनता है। संसार में बहुत-से ऐसे लोग पाये जा सकते हैं, जिनके विचार बड़े ही उदात्त, महान् और आदर्शपूर्ण होते हैं; किन्तु उनकी क्रियाएँ उनके अनुरूप नहीं होतीं। विचार पवित्र हों और कर्म अपावन, तो वह सच्चरित्रता नहीं हुई। इसी प्रकार बहुत-से लोग ऊपर से बड़े ही सत्यवादी, आदर्शवादी और धर्म-कर्म वाले दीखते हैं, किन्तु उनके भीतर कलुषपूर्ण विचारधारा बहती रहती है। ऐसे व्यक्ति भी सच्चे चरित्र वाले नहीं माने जा सकते। सच्चा चरित्रवान् वही माना जाएगा और वास्तव में वही होता भी है, जो विचार और आचार दोनों को समान रूप से उच्च और पुनीत रखकर चलता है।

(अखण्ड ज्योति-१९६९, मई-२२)

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आपके पास जो भी घटना आए, परिस्थिति आए, व्यक्ति या विचार आए, प्रत्येक के ऊपर कसौटी लगाइए और देखिए कि इसमें क्या उचित है और क्या अनुचित है? कौन नाराज होता है और कौन खुश होता है, यह देखना आप बंद कीजिए। अगर आपने यह विचार करना शुरू कर दिया कि हमारे हितैषी किस बात में प्रसन्न होंगे, तो फिर आप कोई सही काम नहीं कर सकेंगे। हमको भगवान् की प्रसन्नता की जरूरत है।

(५ अप्रैल १९७६, संदेश)

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जीवन प्रगति में मनुष्य का अहंकार बहुत बड़ा बाधक है। इसके वशीभूत होकर चलने वाला मनुष्य प्रायः पतन की ओर ही जाता है। श्रेय पथ की यात्रा उसके लिए दुरूह एवं दुर्गम हो जाती है। अहंकार से भेद बुद्धि उत्पन्न होती है, जो मनुष्य को मनुष्य से ही दूर नहीं कर देती, अपितु अपने मूल स्रोत परमात्मा से भी भिन्न कर देती है। परमात्मा से भिन्न होते ही मनुष्य में पाप प्रवृत्तियाँ प्रबल हो उठती हैं। वह न करने योग्य कार्य करने लगता है। अहंकार के दोष से मति विपरीत हो जाती है और मनुष्य को गलत कार्यों में ही सही का भान होने लगता है।

(अखण्ड ज्योति-१९६९, जून-५६)

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हम भीरु बनकर नहीं, निर्भय होकर जिएँ। निर्भयता मनुष्य की जीवन्त आत्मा का प्रमाण है। जिसकी आत्मा मर चुकी होती है, उसका तेज समाप्त हो गया होता है। वह मनुष्य कायर बन जाता है।

आत्मा की तेजस्विता सदाचार से बढ़ती और बनी रहती है। जब मनुष्य सदा सत्य ही बोलता है, सत्य व्यवहार करता है और सत्य विचार ही करता है, तो उसकी आत्मा का तेज प्रखर होता है और उसी के अनुसार ही उसकी निर्भयता का भाव भी विकसित हो जाता है। जो झूठा, छली और दम्भी होता है, वह ऊपर से एक बार निर्भयता का नाटक भले ही कर दिखाए, पर वास्तव में वह होता बड़ा कायर है। अपराध वृत्ति के लोग निर्भय रह ही नहीं सकते, यह असंभव है।

(अखण्ड ज्योति-१९७१, अगस्त-५२)

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दुनिया वाले तलवार चलाने वालों को शूरमा कहते हैं और जो जितनों के सिर काट सके, उसे उतना ही बड़ा वीर बताते हैं। अपनी दृष्टि में यह कोई वीरता का चिह्न नहीं। यह कार्य तो कसाई भी निपुणता के साथ बड़ी मात्रा में करते रहते हैं। शौर्य का चिह्न है-अनौचित्य को अंगीकार करने से स्पष्ट इनकार कर सकने की हिम्मत और साहस । आत्मा की पुकार का अनुसरण करते हुए वह कदम उठाना जो व्यक्ति और समाज का स्तर ऊँचा बनाने की दृष्टि से वांछनीय है।

आत्मिक प्रगति प्रचण्ड मनोबल की अपेक्षा करती है और ऐसे साहस का विकास चाहती है, जो सत्य को धारण कर सकने में फौलाद जैसा मजबूत सिद्ध हो सके।

(यु०नि०यो का दर्शन स्वरूप-४.७०)

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समाज जिसके ऊपर विश्वास नहीं करता, लोग जिसे संदेह और शंका की दृष्टि से देखते हों, चरित्रवान् होने पर भी उसके चरित्र का कोई मूल्य-महत्त्व नहीं है। वह अपनी निज की दृष्टि में भले ही चरित्रवान् बना रहे। यथार्थ में चरित्रवान् वही है, जो अपने समाज, अपनी आत्मा और अपने परमात्मा की दृष्टि में समान रूप से असंदिग्ध और संदेह रहित हो। इस प्रकार की मान्य और नि:शंक चरित्रमत्ता ही वह आध्यात्मिक स्थिति है, जिसके आधार पर सम्मान, सुख, सफलता और आत्म-शान्ति का लाभ होता है। मनुष्य को अपनी चारित्रिक महानता की अवश्य रक्षा करनी चाहिए। यदि चरित्र चला गया, तो मानो मानव जीवन का सब कुछ चला गया।

(अखण्ड ज्योति-१९६९, मई-२२)

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हम कोई ऐसा काम न करें, जिसमें अपनी अंतरात्मा ही अपने को धिक्कारे। इस तथ्य का निरन्तर ध्यान बनाये रखा जाए। अपनी क्षुद्रताएँ और दुष्टताएँ दूसरों से छिपाकर रखी जा सकती है, दूसरों को झुठलाया और भरमाया जा सकता है, पर अपने आपसे तो कुछ छिपाया नहीं जा सकता। दूसरे तो किसी भय या प्रलोभन से अपने दोषों को सहन कर सकते हैं, पर आत्मा तो वैसा क्यों करेगा? आत्म-धिक्कार, आत्म प्रताड़ना, आत्म-असंतोष, आत्म-विद्रोह मानवी चेतना को मिलने वाला सबसे बड़ा दण्ड है।

(यु०नि०यो० दर्शन स्वरूप-१.२२)

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आत्मा की पुकार अनसुनी करके यदि हम लोभ, मोह के पुराने ढर्रे पर चलते रहे, तो आत्मधिक्कार की इतनी विकट मार पड़ेगी कि झंझट से बच निकलने और लोभ, मोह को न छोड़ने की चतुरता बहुत महँगी पड़ेगी। अंतर्द्वन्द्व उन्हें किसी काम का न छोड़ेगा। मौज-मजा का आनंद आत्म-प्रताड़ना न उठाने देगी और साहस की कमी से ईश्वरीय निर्देश पालन करते हुए जीवन को धन्य बनाने का अवसर भी हाथ से निकल जाएगा। हमको इस दुहरी दुर्गति से बचना चाहिए। सही को अपनाने और गलत को छोड़ देने का साहस ही युग निर्माण परिवार के परिजनों की वह पूँजी है, जिसके आधार पर वे युग संधि की वेला में ईश्वर प्रदत्त उत्तरदायित्व का सही रीति से निर्वाह कर सकेंगे।

(यु०नि०यो० का दर्शन स्वरूप-१.२६)

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इतिहास साक्षी है कि बिना लड़े भगवान् कृष्ण ने अर्जुन का सारथी मात्र बनकर पाण्डवों को जिता दिया और दुर्योधन शक्तिशाली सेना प्राप्त करके भी हारा। दुर्योधन ने भूल की जो स्वयं भगवान् के समक्ष सेना को ही महत्त्वपूर्ण समझा, किन्तु आज भी हम सब दुर्योधन बने हुए हैं और निरन्तर यही भूल करते जा रहे हैं। संसारी शक्तियों, भौतिक सम्पदाओं के बल पर ही जीवन संग्राम में विजय चाहते हैं, ईश्वर की उपेक्षा करके। हम भी तो भगवान् और उनकी भौतिकस्थूल शक्ति दोनों में से दुर्योधन की तरह स्वयं ईश्वर की उपेक्षा कर रहे हैं और जीवन में संसारी शक्तियों को प्रधानता दे रहे हैं, किन्तु इससे तो कौरवों की तरह असफलता ही मिलेगी।

(वाङ्मय-८, पृ० १.६२)

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हमें संसार में रहना है, तो सही व्यवहार करना भी सीखना चाहिए। सेवा-सहायता करना तो आगे की बात है, पर इतनी सज्जनता तो हर व्यक्ति में होनी चाहिए कि जिससे वास्तव पड़े उससे नम्रता, सद्भावना के साथ मीठे वचन बोले। इसमें न तो पैसा व्यय होता है, न समय। जितने समय में कटुवचन बोले जाते हैं, अभद्र व्यवहार किया जाता है, उससे कम समय में मीठे और शिष्ट तरीके से भी बरता जा सकता है। जो बात कड़वेपन और रुखाई के साथ कही गई थी, उसे ही मिठास के साथ उतनी ही देर में कहा जा सकता है। उद्धत स्वभाव दूसरों पर बुरी छाप छोड़ता है और उसका परिणाम कभी-कभी बुरा ही निकलता है। अकारण अपने शत्रु बढ़ाते चलना बुद्धिमानी की बात नहीं है। इस स्वभाव का व्यक्ति अंतत: घाटे में रहता है।

(नैतिक शिक्षा-१, पृ० ७१)

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दूसरा दूसरों को न तो खींच सकता है और न दबा सकता है। बाहरी दबाव क्षणिक होता है। बदलता तो मनुष्य अपने आप है, अन्यथा रोज उपदेश, प्रवचन सुनकर भी इस कान से उस कान निकाल दिये जाते हैं। दबाव पड़ने पर बाहर से कुछ दिखा दिया जाता है, भीतर कुछ बना रहता है। इन विडम्बनाओं से क्या बनता है। बनेगा तो अंत:करण के बदलने से और इसके लिए आत्म-प्रेरणा की आवश्यकता है। इन दिनों यही होने जा रहा है। सबसे पहले जाग्रत् आत्माओं के भीतर आत्म-परिवर्तन की तिलमिलाहट होगी। अंधी भेड़ों के गिरोह में से अपने को अलग निकालेंगे और स्वतंत्र चिंतन करेंगे। क्रान्ति यही से आरंभ होगी।

(वाङ्मय-६६, पृ० १.१६)

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इन दिनों विषम परिस्थितियों के बीच हम रह रहे हैं। असुरता के हाथों देवत्व का पराभव होता नजर आता है। कभी हिरण्याक्ष, हिरण्यकश्यप, वृत्रासुर, भस्मासुर ने आतंक उत्पन्न किये थे वह परिस्थितियाँ आज की परिस्थितियों के साथ पूरी तरह तालमेल खाता है। उन दिनों शासक वर्ग का ही आतंक था, पर आज तो राजा-रंक, धनी-निर्धन, शिक्षित-अशिक्षित, वक्ता-श्रोता सभी एक राह पर चल रहे हैं। छद्म और अनाचार ही सबका इष्टदेव बन चला है। उपाय दो ही है। एक यह कि शुतुरमुर्ग की तरह आँखें बंद करके भवितव्यता के सामने सिर झुका दिया जाए, जो होना है, उसे होने दिया जाए। दूसरा यह कि जो सामर्थ्य के अंतर्गत है, उसे करने में कुछ उठा न रखा जाए।

(वाङ्मय-२८, पृ० १.१४)

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ईश्वर के यहाँ देर हो सकती है, पर अन्धेर नहीं। सरकार और समाज से पाप को छिपा लेने पर भी आत्मा और परमात्मा से उसे छिपाया नहीं जा सकता। इस जन्म में या अगले जन्म में हर बुरे-भले कर्म का प्रतिफल निश्चित रूप से भोगना पड़ता है।

पाप का दण्ड आज नहीं भुगतना पड़ेगा, तो किसी को यह नहीं समझ बैठना चाहिए कि उससे सदा के लिए छुट्टी हो गई। ईश्वरीय कठोर व्यवस्था उचित न्याय और उचित कर्मफल के आधार पर ही बनी हुई है, सो तुरन्त न सही कुछ देर बाद अपने कर्मों का फल भोगने के लिए हर किसी को तैयार रहना चाहिए।

(वाङ्मय-६६, पृ० ६.१७)

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अनीति को सहन न करने, किसी पर अनीति न होने देने की हिम्मत हर जीवित मनुष्य में होनी चाहिए। बहादुरी मानवता का एक आवश्यक अंग है। पौरुष संपन्न को ही पुरुष कहते हैं। शौर्य और साहस मनुष्य जीवन की अनिवार्य आवश्यकताएँ हैं। इनके बिना अन्न खाने और साँस लेने भर के लिए जीवित मनुष्य को एक प्रकार से मृतक या पतित ही कहा जा सकता है। कोई अवसर ऐसे होते हैं, जिनमें जोखिम उठाना भी गर्व और गौरव का कारण होता है। उद्दण्डता जाग्रत् आत्माओं के नाम के अवरोध में जोखिम उठाकर आगे आना सत्साहस है, जिसकी प्रशंसा मूक मानवता का कण-कण करता रहेगा।

(वाङ्मय-६६, पृ०१.४४)

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धर्मनिष्ठा की प्रामाणिकता परीक्षा की कसौटी पर कसे जाने से ही सिद्ध होती है। धर्म मात्र कल्पना तक सीमित नहीं हो सकता। पूजा-पाठ एवं कथाप्रसंगों तक धर्म धारणा को सीमित नहीं रखा जा सकता। वह अपनी प्रखरता प्रमाणित करने के लिए मचलती रहती है और समय की पुकार पर आदर्शों के लिए दुःसाहस भरे कदम उठाने में नहीं चूकती। विभीषण ने भाई का विरोध किया, प्रताड़ना सही और अपने को खतरे में डाला। हनुमान ने समुद्र लाँघने, पर्वत उठाने और लंका दहने के लिए अपनी पूँछ में आग लगाने देने जैसे जोखिम उठाये। वस्तुतः धर्मनिष्ठा कितनी गहरी है, इसकी परख यही है कि वह ईश्वरीय प्रयोजन पूरे करने में, अनीति के विरोध और नीति के समर्थन के लिए किस सीमा तक अग्नि परीक्षा में प्रवेश करने का साहस भरा परिचय प्रस्तुत करती है।

(वाङ्मय-२९, पृ० ५.२०)

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भारतीय संस्कृति के अध्यात्म स्तम्भ वाला दुर्ग ढह चुका है। आस्तिकता और कर्त्तव्य परायणता की नींव हिल चुकी है। नीति और सदाचरण की चौपाल फूट रही है। आदर्श और सिद्धान्तों के द्वार अस्तव्यस्त हो चुके।स्वास्थ्य, मनोबल, सुदृढ़ गृहस्थ, जातीय संगठन का मसाला लगभग समाप्त सा है। उस दुर्ग पर दखल देने के लिए बाह्य संस्कृतियाँ अवसर हूँढ रही हैं। ऐसे समय में प्रत्येक प्रबुद्ध व्यक्ति का यह कर्तव्य हो जाता है कि वह देश की आध्यात्मिक क्रान्ति की भूमिका निभाने में हिस्सा ले। यह अंतिम समय, अंतिम चेतावनी है। अभी भी राष्ट्र सजग न हुआ, तो भारतीय संस्कृति का सूर्य अस्त ही हुआ मानना चाहिए।

(वाङ्मय-४६, पृ० १.८३)

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हमारी दो प्रकार की कार्यपद्धति है। एक को ढाल और दूसरी को तलवार कहना चाहिए। एक से बचाव करना है और दूसरे से खदेड़ना है। इन दिनों खदेड़ने वाला काम प्रत्यक्षत: बड़ा दीखता है, क्योंकि असुरता ने जीवन-मरण जैसी समस्या उत्पन्न कर दी है। विनाश अपनी चरम सीमा पर है। उसे अभी और कुछ समय खेल खेलने दिया जाए, तो फिर लाखों वर्षों की संचित सभ्यता और प्रकृति का कहीं अतापता भी नहीं चलेगा। इस विनाश-विभीषिका के उत्पादन केन्द्रों पर समय रहते गोलाबारी करनी है, ताकि महाप्रलय का अवसर प्राप्त करने से पूर्व ही वे अपने हाथ-पैर तुड़ा बैठे और वह न कर सकें, जो करने की डींग हाँकते और आतंक मचाते हैं। यह काम हमारे जिम्मे है।

(वाङ्मय-२८, पृ० १.३४)

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मनुष्य जब तक जीवित है, उसे परिवर्तन पूर्ण उतार-चढ़ाव और बनने-बिगड़ने वाली अनुकूल एवं प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना ही होगा। दुःख-सुख, हानि-लाभ, सफलता-असफलता, सुविधा एवं कठिनाइयों के बीच से गुजरना ही होगा। लाख चाहने और प्रयत्न करने पर भी वह इनको आने से नहीं रोक सकता। वे आएँगी ही और मनुष्य को इनसे जूझना ही होगा।

(अखण्ड ज्योति-१९६६, अप्रैल-११)

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आत्म-वंचना में मत भटको। दम्भ का आश्रय मत लो। केवल अपने ही स्वर्ग या मुक्ति, सुख के स्वार्थ में मत डूबो। यह शर्म की बात है कि अब तक तुम अपना जीवन केवल सोने, गप्प लड़ाने और निरर्थक कार्यों के पीछे व्यर्थ बिताते रहे। अब समय निकट आता जा रहा है। अब भी विलम्ब नहीं हुआ है। इसी समय से निष्कपट और सच्चाई धारण करो। सच्ची सेवा का मार्ग तलाश करो। लोक कल्याणकारी सत्कार्यों में जुट जाओ। इस प्रकार तुम अपने को भगवान् का कृपापात्र बना सकोगे।

(अखण्ड ज्योति-१९४५, अक्टूबर)

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केवल कल्पना ही कल्पना मनुष्य के लिए अहितकर है। हमारे विचारों में क्रिया का समन्वय अवश्य होना चाहिए। जो व्यक्ति उत्साहपूर्वक कार्य में प्रविष्ट होता है, वही विजयी भी होता है। जो केवल माला जपने में रहेगा, स्वयं परिश्रम न करेगा, उसे कुछ भी प्राप्त न होगा। हम मानते हैं कि विचार में प्रबल शक्ति है, किन्तु विचार में शक्ति तब ही है, जब उसे अंकुरित होने का सुअवसर प्राप्त हो। जो विचारों के प्रवाह को अवरुद्ध करता है, वह अपनी उन्नति को पीछे धकेलता है। जो विचारों में क्रिया का योग नहीं देता, वह विचारों के अंकुरों को पल्लवित होने से, उन्हें फलित होने से रोकता है।

(अखण्ड ज्योति-१९४७, सितम्बर-१६)

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किसी के उपदेश की सत्यता की जाँच लोग उसके आचरण से ही किया करते हैं। इसलिए यदि ज्ञानी पुरुष स्वयं उपदेश अनुरूप आचरण-सत्कर्म नहीं करेगा, तो वह जनसामान्य को आलसी एवं निरुत्साही बनाने का एक बहुत बड़ा कारण हो जाएगा।

(अखंड ज्योति-१९४८, मार्च)

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मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है। वह चाहे तो देवता भी बन सकता है और यदि चाहे तो नर-पिशाच भी, परन्तु इनके परिणामों में चुनाव की कोई सुविधा नहीं है। जिन्होंने भी असुरता पकड़ी और नृशंसता अपनायी, उन्हें अंततः उसको दण्ड भुगतना ही पड़ा। भले ही वे तत्काल अपने अहंकार को संतुष्ट कर सके हों, पर परिणाम में उससे भी भयंकर यातना तथा अन्त में उनकी दु:खद स्मृतियों के अलावा और कुछ भी नहीं मिल पाया है।

(वाङ्मय-६४, पृ० २.३१)

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चरित्र का मेरुदण्ड अपने प्रति ईमानदारी है। यह अपने प्रति ईमानदारी तभी आती है, जब हम हर कदम पर अपने को देखते-परखते और तौलते चलते हैं। इस दृष्टि से आत्म-निरीक्षण चरित्र की जड़ है। इसी की प्रेरणा से मनुष्य दोषों को दूर करने, अपने को बदलने, दूसरों के लिए उपयोगी बनने का निश्चय करता है। ऐसी आदमी तब तक चुप नहीं बैठता जब तक उसके जीवन में आत्मा की शक्ति स्थापित न हो जाए।

(वाङ्मय-६४, पृ० ५.१६)

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झूठ आखिर झूठ ही है। वह आज नहीं तो कल जरूर खुल जाएगा। असत्य का जब भण्डाफोड़ होता है, तो उससे मनुष्य की सारी प्रतिष्ठा नष्ट हो जाती है। उसे अविश्वासी और ओछा आदमी समझा जाने लगता है। झूठ बोलने में तात्कालिक थोड़ा लाभ दिखाई पड़े तो भी आप उसकी ओर ललचाइए मत, क्योंकि उस थोड़े लाभ के बदले में अंततः अनेक गुनी हानि होने की संभावना है। आप अपने वचन और कार्यों द्वारा सच्चाई का परिचय दीजिए।

(अखंड ज्योति-१९४७, जुलाई)

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घंटों निरर्थक बकवास करने से एक छोटे से तत्त्व या उपदेश पर अमल करना, अपनी आत्मा का विकास करना, सामाजिक तथा आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ना अधिक कल्याणकर है। बहुत-सी बातें बनाना सरल है, दूसरों को उपदेश देने में बहुतेरे कुशल होते हैं, किन्तु वास्तविक तथ्य यह है कि जो बात अंतरात्मा को लगे, उसे कार्य रूप में परिणत कर प्रत्यक्ष किया जाए। सफलता के लिए यदि कोई आवश्यक चीज है, तो वह कठोर कर्म ही है। कर्म ही संसार में मुख्य तत्त्व है। केवल बातें बनाना शेखचिल्लियों तथा ढपोरशंखों का काम है।

(अखण्ड ज्योति-१९४७, सितम्बर)

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लेखों और भाषणों का युग अब बीत गया। गाल बजाकर लम्बी-चौड़ी डींग हाँककर या बड़ेबड़े कागज काले करके संसार के सुधार की आशा करना व्यर्थ है। हम अपना मानसिक स्तर ऊँचा उठाएँ। चरित्र की दृष्टि से अपेक्षाकृत उत्कृष्ट बनें । अपने आचरण से ही दूसरों को प्रभावशाली शिक्षा दी जा सकती है। गणित, भगोल, इतिहास आदि की शिक्षा में कहनेसुनने की प्रक्रिया से काम चल सकता है, पर व्यक्ति निर्माण के लिए तो निखरे हुए व्यक्तित्वों की ही आवश्यकता पड़ेगी। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए सबसे पहले हमें स्वयं ही आगे आना पड़ेगा।

(अखण्ड ज्योति-१९६२, सितम्बर-३५)

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हमें स्वस्थ परम्पराओं को जन्म देना चाहिए। समाज को, व्यक्ति का वास्तविक हित जिसमें होता है, उसी मार्ग को अपनाना चाहिए। अपना मन सदा नीति, न्याय और औचित्य के पक्ष में रखना चाहिए। कुकर्म करते हुए एक छोटे बच्चे से भी, अपनी अंतरात्मा से भी डरना चाहिए, पर सत्कर्म का आरंभ करते हुए हमें सारे समाज की, सारी दुनिया की भी परवाह नहीं करना चाहिए। अनीति और अनाचार के विरुद्ध यदि अकेले ही लड़ने को खड़ा होना पड़े, तो उसमें झिझकना नहीं चाहिए।

(वाङ्मय-६४, पृ० १.१८)

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मन की चाल दुमुँही हैं। जिस प्रकार दुमुँहा साँप कभी आगे चलता है, कभी पीछे। उसी प्रकार मन में दो परस्पर विरोधी वृत्तियाँ काम करती रहती हैं। उनमें से किसे प्रोत्साहन दिया जाए और किसे रोका जाए, यह कार्य विवेक बुद्धि का है। हमें बारीकी के साथ यह देखना होगा कि इस समय हमारे मन की गति किस दिशा में है ? यदि सही दिशा में प्रगति हो रही है, तो उसे प्रोत्साहन दिया जाए और यदि दिशा गलत है, तो उसे पूरी शक्ति के साथ रोका जाए, इसी में बुद्धिमत्ता है; क्योंकि सही दिशा में चलता हुआ मन जहाँ हमारे लिए श्रेयस्कर परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकता है, वहाँ कुमार्ग पर चलते रहने से एक दिन दु:खदायी दुर्दिन का सामना भी करना पड़ सकता है।

(अखण्ड ज्योति-१९६२, जून-४४)

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इस उथल-पुथल के युग में जबकि समुद्र मंथन जैसा संघर्ष चल रहा है, एक ओर बुराई की तो दूसरी ओर अच्छाई की शक्ति जीवन-मरण के युद्ध में संलग्न है, तो हमें निरपेक्ष दर्शक की तरह नहीं बैठे रहना चाहिए। पाप और पतन की ओर ले जाने वाली दुष्प्रवृत्तियों से जूझने के लिए और पुण्य एवं उत्थान की ओर अग्रसर करने वाली सत्प्रवृत्तियों के समर्थन के लिए यदि हम कुछ न करेंगे, तो उसके परिणाम अत्यधिक भयानक होंगे। ऐसे संकटकाल में मौन रहना एवं निष्क्रियता धारण करना भी एक प्रकार का पाप है।

(अखण्ड ज्योति-१९६२, फरवरी-५९)

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जिधर भी दृष्टि पसारकर देखते हैं, तो इस सुन्दर-सज्जित दुनिया में एक ही कमी दीखती हैउच्च भावनाओं, उदारता, आत्मीयता एवं कर्तव्य निष्ठा की। इस अभाव के कारण परमात्मा की यह सुन्दर कृति डरावनी और नरक-सी वीभत्स दिखती है। अविश्वास, संदेह, आशंका और विपत्ति की घटाएँ ही चारों ओर घुमड़ती दिखती हैं। यह सब कुछ विकसितऔर गतिशील दिखता है; पर एक ही वस्तु मूर्छित, निर्जीव दिखती है, वह है-मनुष्य की अंतरात्मा। इसी की उपेक्षा सबसे अधिक हो रही है। सब कुछ बढ़ाने की योजनाएँ बन रही हैं, पर मनुष्यत्व का, चरित्र और अत्यधिक भयानक होंगे। ऐसे संकटकाल में मौन रहना एवं निष्क्रियता धारण करना भी एक प्रकार का पाप है।

(अखण्ड ज्योति-१९६२, फरवरी-५९)

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जिधर भी दृष्टि पसारकर देखते हैं, तो इस सुन्दर-सज्जित दुनिया में एक ही कमी दीखती हैउच्च भावनाओं, उदारता, आत्मीयता एवं कर्तव्य निष्ठा की। इस अभाव के कारण परमात्मा की यह सुन्दर कृति डरावनी और नरक-सी वीभत्स दिखती है। अविश्वास, संदेह, आशंका और विपत्ति की घटाएँ ही चारों ओर घुमड़ती दिखती हैं। यह सब कुछ विकसितऔर गतिशील दिखता है; पर एक ही वस्तु मूर्छित, निर्जीव दिखती है, वह है-मनुष्य की अंतरात्मा। इसी की उपेक्षा सबसे अधिक हो रही है। सब कुछ बढ़ाने की योजनाएँ बन रही हैं, पर मनुष्यत्व का, चरित्र और आदर्शवाद का भी उत्कर्ष हो, इसकी न तो आवश्यकता समझी जाती है और न चेष्टा की जाती है।

(वाङ्मय-६४, पृ० १.२४)

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सच्चा मनुष्य एक शूरवीर सिपाही की भाँति निर्भीक रहता है। वह आदर्श और सिद्धान्तों का पालन करने के लिए अपने शरीर के टुकड़े-टुकड़े करा देने पर भी पथ से विचलित नहीं होता। दूसरों के प्राणों की रक्षा करने के लिए जिसने अपने प्राणों की बाजी लगा डाली है, उस उदार चित्त सैनिक का जीवन किसी संत से कम नहीं है। तीर, तलवारों की वर्षा जिसके विश्वास को डगमगाती नहीं, जो अपने प्राणों से बढ़कर राष्ट्र के गौरव और सम्मान को समझता है, वही शूरवीर इस धरती पर धन्य होता है। जीते तो सभी हैं; पर जो सिद्धान्त के लिए जीवित हैं, जीना उन्हीं का सार्थक है।

(अखण्ड ज्योति-१९६२)

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पाप की अवहेलना मत करो। छोटा-सा बिच्छू अपने डंक से तिलमिला देने वाली पीड़ा उत्पन्न कर सकता है। पाप का प्रश्रय बिच्छु पालने के समान है। मन में पाप प्रलोभनों को पालने से कभी भी भयंकर विपत्ति टूट पड़ने की आशंका बनी रहेगी। आग की छोटी चिनगारी विशाल तन को जलाकर खाक कर देने वाली दावानल बन सकती है। पाप प्रवृत्ति की चिनगारी कार्यान्वित तो होती नहीं, मन में भीतर छिपी पड़ी है उससे क्या हानि? ऐसा सोचकर उसे उपेक्षापूर्वक प्रश्रय नहीं दिये रहना चाहिए। उसका संचय कभी भी विस्फोटक परिणाम प्रस्तुत कर सकता है।

(अखण्ड ज्योति-१९७४, जुलाई-१८)

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हम जो सोचते हैं, वही सही है, हम जो चाहते हैं, वही उचित है-इस दुराग्रही मान्यता ने मानवी प्रगति में अत्यधिक बाधा उत्पन्न की है और संसार की  शान्ति में भारी व्यवधान उत्पन्न किया है। अधिकाधिक उपभोग का अधिकार हमें है, दूसरों को अभावग्रस्त रहना पड़े, तो वे रहें हमें इसकी क्या चिन्ता है? यह विचार संकीर्ण स्वार्थवाद से भरा है, उसी प्रकार यह मानना भी सरासर अन्याय है कि हम जो सोचते हैं, वही सही है, हमारी चाहना ही न्यायोचित है। उस चाहना की पूर्ति में दूसरों के स्वार्थ यदि टकराते हों, तो भी उनकी उपेक्षा करके अपनी ही इच्छा पूर्ण होनी चाहिए, इस तरह सोचना चिंतन की निकृष्ट संकीर्णता है। उससे अन्याय का ही पोषण हो सकता है और संघर्ष, विद्वेष ही बढ़ सकता है।

(अखण्ड ज्योति-१९७४, जून-१७)

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भविष्य हमेशा अनिश्चित है, लेकिन वर्तमान निश्चित है। अतः अपनी निश्चित निधि को खोकर अनिश्चित के लिए सोच-विचारों में उलझे रहना भविष्य के प्रति वर्तमान का अनादर करना है। वैसे भविष्य की चिन्ता करना बुरा नहीं है। उसकी एक निश्चित योजना-रूपरेखा बनाकर ही वर्तमान की पगडंडी पर चला जा सकता है।

(अखण्ड ज्योति-१९६३, मई-२४)

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संसार का कोई भी महत्त्वपूर्ण कार्य संकट और विघ्न से रहित नहीं होता। उसकी महत्ता ही इसलिए होती है कि वह संकटों और विघ्नों की संभावनाओं से भरा होता है। जिस कार्य में संकट का सामना न करना पड़े और वह आसानी से पूरा हो जाए, तो उसका महत्त्व कम ही रहेगा, फिर वह काम देखने में कितना ही बड़ा क्यों न हो। जो व्यक्ति संकट के भय से प्रगति करने का साहस नहीं करते, उन्हें सोचना चाहिए कि क्या इस जड़ता से वे सर्वथा बच जाएँगे?

(वाङ्मय-५७, पृ० २.४२)

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असुरता इन दिनों अपने पूर्ण विकास पर है। देवत्व सुषुप्त और विश्रृंखलित पड़ा है। आवश्यकता इस बात की है कि देवत्व जगे, संगठित हो तो युग की आवश्यकता एवं ईश्वरीय आकांक्षा की पूर्ति के लिए कटिबद्ध हो। इसके लिए जाग्रत् आत्माएँ आगे आएँ। उसी को अविवेक के विरुद्ध संघर्ष में तत्पर होना है।

(वाङ्मय-६५, पृ० ६.१२)

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भरोसा रखो कि वह जो एकान्त में तुम्हारी गलतियाँ बताये, तुम्हारा मित्र है; क्योंकि बदले में वह तुम्हारी अरुचि और घृणा पाने का खतरा उठाता है। कुछ ही लोग हैं, जो अपनी बुराई सह सकते हैं। वैसे हर आदमी अपनी अधिकतर प्रशंसा में ही आनंद पाता है और यह उन कमजोरियों में से है, जो सारी मानव जाति में है।

(अखण्ड ज्योति-१९७४, अप्रैल-१६)

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सादे एवं सामान्य जीवन में भी यदि विचारों को उच्च रखा जाए,, जो कुछ सोचा, समझा और किया जाए, वह उदात्त एवं आदर्श भावनाओं के अंतर्गत सोचा तथा किया जाए, तो कोई कारण नहीं कि हम सामान्य जीवन परिधि में रहते हुए भी आत्मा से महान् न हो जाएँ। आत्मा की महानता ही तो वास्तविक तथा सर्वोपरि महानता है। जिसे ऊँचे-ऊँचे अथवा आश्चर्यजनक काम करके ही नहीं, केवल सेवाभाव तथा आत्म-परिष्कार के द्वारा भी पाया जा सकता है। और यह किसी भी स्थिति अथवा वर्ग के व्यक्ति के लिए असंभव नहीं, बशर्ते उसके लिए हृदय में जिज्ञासा तथा आकांक्षा का जागरण भर हो जाए।

(अखण्ड ज्योति-१९६९, जनवरी-१६)

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आदर्शों के लिए गहरी निष्ठा रखने वाले व्यक्ति अपने कर्तव्य से इसलिए नहीं रुकते कि उनके मार्ग में खतरा है। खतरे को कमजोर और कायर नहीं उठा सकते, वे घाटा भी नहीं उठा सकते, किन्तु जिन्हें कर्तव्य का बोध है, वे समय पर अपनी जिम्मेदारी पूरी करने में चूकते नहीं। मनोबल का सत्साहस उनका समर्थ साथी होता है।

(वाङ्मय-५७, पृ० २.२३)

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हमारा गायत्री परिवार घटिया स्तर का जीवनयापन करने का कलंक न ओढ़े रहे। प्रकारान्तर से यह लांछन अपने ऊपर भी आता है। हम किस बूते पर अपना सिर गर्व से ऊँचा कर सकेंगे। हमारा कर्तृत्व पोला था या ठोस, यह अनुमान उन लोगों की परख केरके लगाया जाएगा, जो हमारे श्रद्धालु एवं अनुयायी कहे जाते हैं। यदि वे वाचालता भर के प्रशंसक और दण्डवत् प्रणाम भर के श्रद्धालु रहे, तो माना जाएगा कि सब कुछ पोला रहा। यह अवसर न आए। बात बहुत, काम कुछ नहीं वाली विडम्बना का तो अब अन्त होना ही चाहिए।

(अखण्ड ज्योति-१९६९, नवम्बर-६२)

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हमें जानना चाहिए कि मनुष्य केवल शरीर मात्र ही नहीं है। उसमें एक परम तेजस्वी आत्मा भी विद्यमान है। हमें जानना चाहिए कि मनुष्य केवल धन, बुद्धि और स्वास्थ्य के भौतिक बलों से ही सांसारिक सुख, सम्पदा, समृद्धि एवं प्रगति प्राप्त नहीं कर सकता। उसे आत्मबल की भी आवश्यकता है। आत्मा के अभाव में शरीर की कीमत दो कौड़ी भी नहीं रहती। इसी प्रकार आत्मबल के अभाव में तीनों शरीर बल मात्र खिलवाड़ बनकर रह जाते हैं। वे किसी के पास कितनी ही बड़ी मात्रा में क्यों न हो, उससे सुखानुभूति नहीं मिल सकती। वे केवल भार, तनाव, चिन्ता एवं उद्वेग का कारण बनेंगे और यदिकहीं उनका दुरुपयोग होने लगा, तब तो सर्वनाश की भूमिका ही सामने लाकर खड़ी कर देंगे।

(अखण्ड ज्योति-१९६९, फर० ३)

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केवल अपने सुख, अपने मंगल और अपने कल्याण में व्यस्त और अपने ही लोगों का ध्यान रखने वाले लोग ईश्वरीय कर्तव्य से विमुख रहते हैं। अपना मंगल और अपना कल्याण भी वांछनीय है, लेकिन सबके साथ मिलकर, एकाकी नहीं। अपने हित तक बंधे रहने वाले बहुधा स्वार्थी हो जाते हैं। स्वार्थ और ईश्वरीय कर्तव्य में विरोध है। जो स्वार्थी होगा, वह कर्तव्य विमुख ही चलता रहेगा।

(अखण्ड ज्योति-१९६९, जन० ३)

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अगर हम अब तक चले आ रहे मृत रूपों को छोड़ने और नए आदर्शों वाली संस्था की रचना करने में सक्षम नहीं होते, तो हम समाप्त हो जाएँगे। हमने एक महान् सभ्यता के निर्माण के लिए, उज्ज्वल भविष्य की संरचना के लिए पर्याप्त ज्ञान प्राप्त कर लिया है, लेकिन इसे नियंत्रित करने और सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त बुद्धि अर्जित नहीं की है। विचारों और सिद्धान्तों के रूप में हमारे पास युगों-युगों की धरोहर है, लेकिन यह सब तब तक व्यर्थ है, जब तक हम इसे युगानुरूप बनाकर अपने व्यवहार में न ले आएँ, स्वयं आत्मसात् न कर लें।

(अखण्ड ज्योति-१९९८, जून)

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दुर्गुणी परिजन हमें उतना ही दु:ख देते हैं, जितना शरीर में घुसा हुआ कोई निरन्तर पीड़ा देने वाला कष्टसाध्य रोग। शरीर में घुसे हुए रोगों की उपेक्षा करने और उन्हें पनपने देने में एक दिन मृत्यु संकट ही उपस्थित हो जाता है। उसी प्रकार परिजनों में घुसे हुए दुर्गुण घर को नष्ट-भ्रष्ट और नारकीय अग्नि कुण्ड जैसा दु:खदायक बना सकते हैं। समय रहते इलाज जरूरी है। बिगाड़ को रोकने के लिए हम कुछ नहीं करते, तो आगामी पीढ़ियाँ इस निष्क्रियता को क्षमा नहीं करेंगी।

(अखण्ड ज्योति-१९६२, जून-१७)

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हमें जिनसे लड़ना है, उन अज्ञान, अनाचार और अभाव के असुरों का छद्मवेश बहुत ही विकराल है। वे न तो दीख पड़ते हैं और न सामने आते हैं। उनकी सत्ता भगवान् की तरह व्यापक हो रही है। अज्ञान-ज्ञान की आड़ में छिप कर बैठा है। अनाचार को पकड़ना कठिन पड़ रहा है, अभावों का जो कारण समझा जाता है, वस्तुत: उससे भिन्न ही होता है। ऐसी दशा में हमारी लड़ाई व्यक्तियों से नहीं, अनाचार से होगी। रोगियों को नहीं, हम रोगों को मारेंगे। पत्ते तोड़ते फिरने की अपेक्षा जड़ पर कुठाराघात करेंगे। भावी महाभारत अपने अलग ही युद्ध कौशल से लड़ा जाएगा। निहित स्वार्थों से इतने अधिक लोग ओतप्रोत हो रहे हैं, उन्होंने लोकप्रियता की रेशमी चादर ऐसी अच्छी तरह लपेट रखी है कि उन पर व्यक्तिगत रूप से आक्रमण करते न बन पड़ेगा। हम प्रवाहों से जूझेंगे, धाराओं को मोड़ेंगे और अनाचार का विरोध करेंगे। उनके समर्थन में जो लोग होंगे, वे सहज ही लपेट में आ जाएँगे और औंधे मुंह गिर कर मरेंगे।

(अखण्ड ज्योति-१९७४, जनवरी-५७)

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आज हर वर्ग में, हर व्यक्ति में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अनाचार की जड़े अत्यन्त गहराई तक घुसती चली गई हैं। इनमें एक-एक को चुनना संभव नहीं, किसी का दोष सिद्ध करना भी कठिन है। ऐसी दशा में व्यक्तियों से नहीं, धाराओं से हम लड़ेंगे। हर दुष्प्रवृत्ति का भण्डाफोड़ करेंगे और वह ऐसा तीखा होगा कि सुनने वाले तिलमिला उठे और उनमें प्रवृत्त लोगों के लिए मुँह छिपाना कठिन हो जाए। जन आक्रोश ही इतने व्यापक भ्रष्टाचार से लड़ सकता है। हम उसी को उभारने में लगे हैं। समय ही बताएगा कि हमारा संघर्ष कितना तीखा और कितना बाँका होगा। बौद्धिक क्रान्ति की, नैतिक क्रान्ति की, सामाजिक क्रान्ति की दावानल इतनी प्रचण्डता पूर्वक उभारी जाएगी कि उसकी लपटें आकाश चूमने लगें। अज्ञान और अनाचार का कूड़ा-करकट उसमें जलकर ही रहेगा।

(अखण्ड ज्योति-१९७४, जनवरी-५७)

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अब ठीक यही समय है कि प्राणवान्, प्रज्ञावान् अपना केंचुल बदल डालें। अंतराल में उत्कृष्ट उमंगें और क्रिया-कलापों का, आदतों का नये सिरे से ऐसा निर्धारण करें, जो गायत्री परिवार के लिए प्रेरणाप्रद बन सके। आदर्शों को महत्त्व दें। यह न सोचें कि तथाकथित सगे-संबंधी क्या परामर्श देते हैं? 

प्रस्तुत समय हमसे संयम और अनुशासन अपनाये जाने की अपेक्षा करता है। प्रचलन तो ढलान की ओर लुढ़कने का है। उत्कृष्टता की ऊँचाई तक उछलने के लिए शूरवीरों जैसा साहस दिखाना पड़ता है। इस प्रदर्शन को अभी टाल दिया गया तो संभव है, ऐसा अवसर फिर जीवन में आये ही नहीं।

(वाङ्मय-२८, पृ० २.१९)

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मानव जीवन की सार्थकता के लिए विचार पवित्रता अनिवार्य है। केवल मात्र ज्ञान, भक्ति और पूजा से मनुष्य का विकास एवं उत्थान नहीं हो सकता। पूजा, भक्ति और ज्ञान की उच्चता व श्रेष्ठता का व्यावहारिक रूप से प्रमाण देना पड़ता है। जिसके विचार गंदे रहते हैं, उससे सभी घृणा करते हैं। शरीर गंदा रहे तो स्वस्थ रहना जिस प्रकार कठिन हो जाता  है, उसी प्रकार मानसिक पवित्रता के अभाव में सज्जनता, प्रेम और सद्व्यवहार के भाव नहीं उठ सकते।

(अखण्ड ज्योति-१९६४, अगस्त)

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आत्म-विश्वास का अर्थ है-अपनी परिस्थितियों और समस्याओं का हल अपने आप में ढूंढना। आप क्यों दूसरे लोगों से सहायता की याचना करते हैं। उनके पास भी तो वही उपकरण हैं, जो परमात्मा ने आपको भी दिये हैं। क्यों नहीं अपने हाथ-पाँव चलाते। अपनी बुद्धि का उपयोग करते। बाहरी मनुष्य आपको सहायता देकर ऊँचे उठा नहीं सकता। इसके लिए आपको अपनी ही शक्तियों का सहारा पकड़ना पड़ेगा। प्रत्येक दशा में आत्म-विश्वास जाग्रत् करना पड़ेगा।

(अखण्ड ज्योति-१९६४, नवम्बर-१७)

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ईमानदारी और प्रामाणिकता ही किसी व्यक्ति का वजन बढ़ाती है। बेईमाने, लफंगे, झूठे, ठग और चालाक व्यक्ति अपनी इज्जत खो बैठते हैं और फिर उनकी साधारण बातों पर भी कोई भरोसा नहीं करता। लोग यह भारी भूल करते हैं कि अपने दोष-दुर्गुणों के छिपे रहने की बात सोचते रहते हैं। यह सर्वथा असंभव है। पारा पचता नहीं। कोई खा ले तो शरीर में से फूट निकलता है। दुष्प्रवृत्तियाँ और दुर्भावनाएँ, पाप और कुकर्म, निकृष्टता और दुष्टता के जो भी तत्त्व अपने भीतर होंगे, उनके छिपे रहने की कोई संभावना नहीं है। पाप छत पर चढ़कर चिल्लाते हैं-यह उक्ति सोलहों आने सच है। मनुष्य की दुष्प्रवृत्तियाँ कोई प्रतिक्रिया उत्पन्न न करें, यह संभव नहीं शाश्वत सत्य को झुठलाने का प्रयास न करना ही श्रेयस्कर है।

(वाङ्मय-६६, पृ० १.२८)

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नये युग की रचना के लिए अब ऐसे व्यक्तित्वों की ही आवश्यकता है, जो वाचालता और प्रचारप्रसार से दूर रहकर अपने जीवनों को प्रखर एवं तेजस्वी बनाकर अनुकरणीय आदर्श उपस्थित करें। आदर्शों पर जिनकी निष्ठा नहीं है, ऐसे ओछे लोग न तो अपने को विकसित कर सकते हैं और न शान्तिपूर्ण सज्जनता की जिन्दगी ही जी सकते हैं, फिर इनसे युग निर्माण के उपयुक्त उत्कृष्ट चरित्र उत्पन्न करने की आशा कैसे की जाए? आदर्श व्यक्तियों के बिना दिव्य समाज की भव्य रचना का स्वप्न साकार कैसे होगा? जरूरत उन लोगों की है, जो अपनी आस्था की सच्चाई प्रमाणित करने के लिए बड़ी से बड़ी परीक्षा का उत्साहपूर्ण स्वागत करे।

(वाङ्मय-६६, पृ० २.७६)

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मनुष्य की श्रेष्ठता की कसौटी यह होनी चाहिए कि उसके द्वारा मानवीय उच्च मूल्यों का निर्वाह कितना हो सका, उनको कितना प्रोत्साहन दे सका। योग्यताएँ, विभूतियाँ तो साधन मात्र हैं। लाठी एवं चाकू स्वयं न तो प्रशंसनीय है, न निन्दनीय। उनका प्रयोग पीड़ा पहुँचाने के लिए हुआ या प्राण रक्षा के लिए? इसी आधार पर उनकी भर्सना या प्रशंसा की जा सकती है। मनुष्य की विभूतियाँ एवं योग्यताएँ भी ऐसे ही साधन हैं। उनका उपयोग कहाँ होता है, इसका पता उसके विचारों एवं कार्यों से लगता है। यदि वे सद् हैं, तो यह साधन भी सद् है, पर यदि वे असद् हैं, तो वह साधन भी असद् ही कहे जाएँगे। मनुष्यता का गौरव एवं सम्मान जड़ साधनों से नहीं, उसके प्राणरूप सविचारों एवं सद्प्रवृत्तियों से जोड़ा जाना चाहिए।

(वाङ्मय-६६, पृ० ५.१३)

 

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