जागो शक्तिस्वरूपा नारी - श्रीराम शर्मा आचार्य Jago Shakti Swaroopa Nari - Hindi book by - Sriram Sharma Acharya
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आचार्य श्रीराम शर्मा >> जागो शक्तिस्वरूपा नारी

जागो शक्तिस्वरूपा नारी

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :60
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15496
आईएसबीएन :00000

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नारी जागरण हेतु अभियान

नव निर्माण अभियान


नव निर्माण अभियान भारत के खोये वर्चस्व को स्थापित करके विश्व को सद्ज्ञान का संदेश और सत्कर्म की प्रेरणा देना चाहता है; किन्तु जब तक यह देश स्वयं दुर्गति ग्रस्त है, तब तक दूसरों की सद्गति क्या करेगा? ऊपर से आदर्श, सिद्धान्तों का आवरण ओढ़े रहना काफी नहीं है। स्टेज पर मेकअप द्वारा पहलवान बनने से कार्य नहीं चलता। ऐसे पहलवान की दुर्गति कोई भी सामान्य व्यक्ति कर सकता है। भारतवर्ष की दुर्गति भी आंतरिक खोखलेपन के कारण हुई। जब हमारा पुरुषार्थ सो गया, तो महाकाल की जय हम भले बोलते रहे; किन्तु मुट्ठी भर आदमियों को लेकर लुटेरे हमें लूट ले गये। सोमनाथ महाकाल की प्रतिमा को ही तोड़ ले गये और उन्हें अपमानजनक स्थानों पर लगा दिया। उसका दोष हम किसी आक्रांता को देकर मिथ्या संतोष भले कर लें; किन्तु असली दोष हमारी कमजोरी को दिया जाएगा।

हम उन मान्यताओं से चिपके रहे, जो हमें भाग्यवाद और देववाद की आड़ में दुर्बल बनाती चली गयी। अंदर से हम खोखले हो गये। आध्यात्मिक क्षमता जागी नहीं और लौकिक क्षमता गँवा बैठे। असली आक्रान्ता वे नहीं, जो हमारी बाह्य सम्पन्नता को लूटते गये, वरन्। वे भ्रान्त धारणाएँ हैं; जिन्होंने हमारे आंतरिक ओज को, आन्तरिक मजबूती को लूट लिया-नष्ट-भ्रष्ट करके रख दिया।

आज भी हमारा समाज ऐसे छद्मवेशी आक्रान्ताओं से मुक्त नहीं है। ऐसा ही एक बड़ा बूंखार, बड़ा निर्दय तथा बड़ा जबर्दस्त लुटेरा हमारा प्यार बना, हमारे बीच रहा है, वह है-विवाहोन्माद। इसे जल्लादी, राक्षसत्व, पैशाचिकता भी कहा जाए, तो अत्युक्ति नहीं। यह समाज के हर वर्ग को चूस-चूसकर फेंकता जा रहा है। इन्सानियत को कहीं टिकने नहीं देना चाहता। इस उन्माद में हम अपनी, अपने परिवार की, अपने समाज की यथार्थ आवश्यकताओं को भुलाकर थोथी शान के प्रदर्शन में हम अपने श्रम की कमाई उड़ा देते हैं। निरर्थक की शान और अकड़ दिखाकर वैमनस्य तथा जीवन भर के लिए कटुता पैदा कर लेते हैं। हम समझते हैं कि हमने अपनी सम्पन्नता की, अपने बड़प्पन की धाक जमा ली; किन्तु वस्तुत: हम अपनी सम्पन्नता और प्रगति की जड़ पर कठोर कुठाराघात करते चलते हैं। यही कारण है कि सारे प्रयासों के बाद भी हमारा समाज पनप नहीं पा रहा है। यह उन्माद लड़की वालों को दहेज के रूप में, अपने दरवाजे की शान के नाम पर लड़के वालों को जेवर, प्रदर्शन आदि के नाम पर, बारातियों को थोड़े समय के लिए नवाब बन जाने की आकांक्षा के रूप में बर्बाद कर रहा है। यह सब चौराहे पर खड़े होकर नोटों की होली जलाकर अपना वैभव दिखाने जैसी मूर्खता है। यह कुरीति अपने समाज को बेईमान तथा अभाव ग्रस्त बनाये रखने के लिए सर्वाधिक दोषी है।

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