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आचार्य श्रीराम शर्मा >> जगाओ अपनी अखण्डशक्ति

जगाओ अपनी अखण्डशक्ति

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :60
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15495
आईएसबीएन :00000

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जगाओ अपनी अखण्डशक्ति

ब्रह्मचर्य रक्षा के सरल उपाय


श्रृंखला के पिछले लेख 'मन-इन्द्रिय और ब्रह्मचर्य' में हमने मन और इन्द्रियों के निग्रह में ब्रह्मचर्य की महानतम भूमिका को पढ़ा था तथा यह भी जाना था कि ब्रह्मचर्य के लिए 'वीर्य एवं एज' रक्षा ही एक मात्र उपाय है। अतः इस लेख में हम 'वीर्य एवं रज' की रक्षा के उपायो पर चर्चा करेंगे। जो निम्नवत हैं-

1. सात्विक एवं स्वास्थ्यवर्द्धक भोजन : भोजन मे यदि क्या खायें, कब खायें, कितना खायें, कैसे खायें इसका विशेष ध्यान नहीं रखा गया, तो शरीर को रोग घेर लेगे, वीर्यनाश को प्रोत्साहन मिलेगा और अपने को पतन वे) रास्ते पर जाने से नहीं रोक सकोगे। इससे बचने के लिए प्रेमपूर्वक, शांत मन से, पवित्र स्थान पर बैठकर भोजन करो। भोजन को खूब चबा-चबा कर, धीरे-धीरे एवं स्वादपूर्वक ग्रहण करें। भोजन करने के तुरन्त बाद पानी कभी न पियें यह भोजन के पाचन के लिए विष का कार्य करता है। यदि पानी पीना हो तो भोजन के मध्य में पिये।

भोजन करने के एक घण्टे पहले एवं एक घटे बाद पानी अमृत के पीने के समान कहा गया है। भोजन में रोटी, चावल की मात्रा कम तथा हरे पत्तेदार सब्जियाँ मौसमी फल एवं सलाद का प्रयोग भरपूर करना चाहिए।

रात्रि का भोजन हल्का, सादा एवं थोड़ी मात्रा में करना चाहिए। रात्रि मे बहुत अधिक गर्म दूध नहीं पीना चाहिये। दूध का प्रयोग सुबह के नाश्ते मे करना अति उत्तम रहता है। रात्रि में अधिक गरम दूध पीने से कब्ज हो जाता है। भोजन में पालक, परवल, मेथी, बबुआ आदि हरी सब्जियाँ, दूध, घी, मट्ठा, मक्खन, पके हुए फल आदि लेने से जीवन मैं सात्विकता बढ़ेगी। काम, क्रोध, मोह आदि विकार घटेंगे तथा प्रत्येक कार्य में प्रसन्नता और उत्साह बढ़ेगा।

अधिक गर्म भोजन सौर गर्म चाय से दाँत कमजोर होते हैं तथा वीर्य भी पतला होने लगता है। पेट में कब्ज होने से ही अधिकाशतः रात्रि को वीर्यपात हुआ करता है। पेट में रुका मल वीर्य नाड़ियों पर दबाव डालता है तथा कब्ज की गर्मी से ही नाड़ियाँ क्षुभित होकर वीर्य को बाहर धकेलती हैं। इसलिए कब्ज से बचो।

कभी भी मल-मूत्र सम्बन्धी हाजत हो तो उरने रोको नहीं। रोके हुए मल-मूत्र से शरीर के भीतर की नाड़ियाँ सुख होकर वीर्य का नाश कराती हैं। प्याज, लहसुन, मांसाहार और मद्यपान - ये वीर्यक्षय में सहायक हैं। अतः इनसे बचो।

शरीर में 'कब्ज' को स्थान मत बनाने दो। इससे बचने के लिए कभी-कभी 'त्रिफला चूर्य' या 'इसबगोल' की भूसी रात्रि को गरम पानी या दूध से लें। तथा बाजार की बनी सामग्री समोसा, टिकिया, बर्गर, पीजा, चाकलेट, बन्द या बहुत कर दें। तथा प्रातः शौच के बाद 'गणेश क्रिया' करें। यह कब्ज की दुश्मन है।


2. उचित आसन एवं व्यायाम करो : 'व्यायाम' का अर्थ पहलवानो के समान मास पेशियाँ बढ़ाना नहीं है। इससे तात्पर्य है शरीर को उसके अनुकूल कसरत जिससे उसमें रोग प्रवेश न करें। शरीर और मन स्वस्थ रहे।

रोज प्रातः काल 3-4 मिनट दौड़ने और तेजी से टहलने से भी शरीर का अच्छा व्यायाम हो जाता है। व्यायाम से भी अधिक उपयोगी आसन हैं। आसन शरीर के समचुति विकास एवं ब्रह्मचर्य साधना के लिए अत्यन्त उपयोगी होते हैं। इससे नाडियाँ शुद्ध होकर सत्वगुण की वृद्धि होती है। परन्तु आसन बिना योग्य गुरु के देख-रेख के अपने आप ईधर-उधर से पढ़ या सुनकर नहीं करने चाहिए अन्यथा वे लाभ की जगह हानि पहुँचा सकते हैं। वीर्यरक्षा की दृष्टि से पश्चिमोत्तानासन तो बहुत ही उपयोगी है। आसन सदैव खाली पेट, शौच के उपरान्त तथा व्यायाम आदि के पश्चात् करने चाहिए।  

स्नान के पूर्व सूखे तौलिये या हाथों से सारे शरीर को खूब रगड़ो। इस प्रकार के घर्षण से शरीर में एक प्रकार की विद्युत शक्ति पैदा होती है, जो शरीर के रोगों को नष्ट करती है। श्वास तेजी से चलने से शरीर में रक्त का ठीक से संचरण होने लगता है और यह अंग प्रत्यंग के मल को निकाल कर फेफड़ों में लाता है। फेफड़ों में प्रविष्ट शुद्ध वायु रक्त को साफ कर मल को अपनें साथ बाहर निकाल ले जाती है। बचा खुचा मल पसीने के रूप मे त्वचा के छिद्रों द्वारा बाहर निकल आता है। इस प्रकार शरीर पर घर्षण करने के बाद स्नान करना अधिक उपयोगी है। इससे पसीने द्वारा बाहर निकला मल धुल जाता है।

त्वचा के रोम छिद्र खुल जाते हैं और वदन में स्फूर्ति का संचार होता है।


3. ब्रह्ममुहूर्त में उठें : ब्रह्ममुहूर्त अर्थात् ब्रह्म का समय। प्रातः 4 बजे के आस-पास का समय ब्रह्ममुहूत, का समय कहा गया है। इस समय में उठकर किसी भी प्रकार की साधना, अध्ययन आदि में संलग्न रहने से उस व्यक्ति की साधना तीव्रगति से बढ़ती एवं फलीभूत होती है। इसका एक अन्य कारण यह भी है कि इस समय प्रकृति का समस्त प्राणी विश्राम की अवस्था में होता है। अतः वातावरण शान्त एवं एकान्त से युक्त होता है। जो साधना में सहायक होता है।

इस समय उठकर व्यायाम, आसन, प्राणायाम करने से 'शुद्ध हवा' मे व्याप्त ओजोन एवं आक्सीजन हमारे स्वास्थ्य को किसी चमत्कार के समान उन्नत, पुष्ट, कान्तिपूर्ण व ओजपूर्ण बना देते हैं। अतः इस समय में सभी को उठकर साधना करनी चाहिए। इससे व्यक्ति वीर्यवान बनता है। तथा उसकी आत्मा में स्थिति होने लगती है। उसे सीधे ईश्वर या ब्रह्म का संरक्षण प्राप्त होने लगता है। प्रकृति उसकी सहायक हो जाती है। उसका चित्त शांत एवं मन प्रफुल्लित रहने लगता है। चारों ओर एक अनोखा आनन्द दिखाई पड़ने लगता है। आलस्य घटता एवं उत्साह बढ़ता जाता है।


4. निरन्तर सत्संग एवं पवित्र ग्रंथों का अध्ययन करो : सत्संग से तात्पर्य है अच्छे एवं पवित्र व्यक्ति का संग। यदि किसी महान एवं उच्च रात का सानिध्य मिल सके तो यह तो सोने पर सुहागा हुआ। परन्तु इस कलियुग अर्थात् आज के युग में 'संत पुरुष' का मिलना अत्यन्त ही कठिन है। अतः व्यक्ति को स्वयं संत बनने का प्रयास करना चाहिए। इसके लिए अच्छे-अच्छे धर्मग्रन्थों को नियमपूर्वक कुछ देर समय निकालकर पढ़ना चाहिए त्तथा अधिक से अधिक प्रयास अच्छे व्यक्तियों के बीच रहने का करना चाहिए। यदि यह न हो पाये तो कुसंग से तो अवश्य ही दूर रहना चाहिए। यदि तुम बुरे लोगो कीसंगत से बचते रहे तो निश्चय ही ईश्वर की तुम पर कृपा होगी और संत, भक्त एवं पवित्र पुरुषों को वे तुम तक किसी-न-किसी माध्यम से पहुँचाकर तुम्हारा जीवन आनन्दमय बना देंगे। सबसे पहले गीता का सोलहवा (16) अध्याय अवश्य पढ़ो। उसमें तुम्हें यह ज्ञात हो जायेगा कि मनुष्य के कौन से गुण दैवी और कौन से गुण आसुरी माने गये हैं। तब देवी गुणो को अपने अन्दर विकसित करने का प्रयास करना होगा। इससे केवल तुम्हीं नहीं वरन् तुम्हारे आस-पास के लोग, बन्धु बांधव-यही नहीं बल्कि आगे आने वाली तुम्हारी सताने भी सद्गुणी, पवित्र, पुष्ट एव अपने धर्म, राष्ट्र एवं कुल का मान बढ़ाने वाली होंगी।


5. त्रिबन्धयुक्त प्राणायाम करें : 'त्रिबन्ध' के अन्दर 'मूल बन्ध' उड्डियान बंध, तथा 'जालन्धर बन्ध' इन तीन का समावेश है। 'मूलबन्ध' से विकारों पर विजय पाने की सामर्थ्य बढ़ती है। उड्डियान बन्ध' से व्यक्ति उन्नति की अनन्त ऊँचाइयों को छूने लगता है। 'जालन्धर बन्ध' से बुद्धि विकसित होती है।

यदि 'निबन्ध' के साथ प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा का अभ्यास किया जाय तो धारणा शक्ति के बढ़ते ही प्रकृति के रहस्य खुलने लगेंगे। स्वभाव की मिठास, बुद्धि की विलक्षणता, स्वारथ्य की सौगात बढ़ने लगेगी। धारणा के बाद ध्यान का अभ्यास करने से समाधि की अवस्था प्राप्त होने लगती है। सबसे पहले सविकल्प तथा इसके सतत अभ्यास के बाद निर्विकल्प समाधि की अवस्था आने पर ऐसे पवित्र व्यक्ति के समक्ष रिद्धिया-सिद्धियाँ हाथ जोड़ कर खड़ी रहती हैं। यक्ष, गन्धर्व, किन्नर उसकी सेवा में तत्पर रहते हैं। ऐसे व्यक्ति के निकट सरसरी लोग मनौती मानकर अपनी मनोकामना पूर्ण कर सकते हैं।  


6. वीर्य रक्षा के कुछ महत्वपूर्ण प्रयोग :

(अ) वीर्य शक्ति का दमन नहीं करना चाहिए, उसे उर्ध्वगामी बनाना है। वीर्य के उर्ध्वगमन में वीर्य स्थूल रूप से ऊपर सहस्त्रार की ओर नहीं जाता वरन् उसे संचालित करने वाली जो कामशक्ति है, उसका उर्ध्वगमन होता है। वीर्य को ऊपर चढ़ाने की नाड़ी शरीर के भीतर नहीं है। इसलिए शुक्राणु ऊपर नहीं जाते बल्कि हमारे भीतर एक विद्युत चुम्बकीय शक्ति होती है जो नीचे की ओर बहती है, तब शुक्राणु सक्रिय होते हैं। इसलिए जब पुरुष की दृष्टि स्त्री के भड़कीले वस्त्रों पर पड़ती है या उसका मन स्त्री का चिन्तन करता है, तब यही शक्ति उसके चिंतन मात्र से नीचे 'मूलाधार केन्द्र' के नीचे जो काम केन्द्र है, उसको सक्रिय कर वीर्य को बाहर धकेलती है।

अतः ज्यों ही किसी स्त्री या पुरुष के दर्शन से या विचार से या कामुक यिचार से आपका ध्यान अपनी जननेन्द्रिय की तरफ खिंचने लगे, तभी आप सतर्क हो जायें। आप तुरन्त जननेन्द्रिय अन्दर ही अन्दर मन से पेट की तरफ खींचे। योग की भाषा में इसे योनि-मुद्रा कहते हैं। अब आँखें बन्द करके ऐसी भावना करो कि मैं अपने जननेन्द्रिय संस्थान से ऊपर सिर मैं स्थित सहस्त्रार चक्र की ओर देख रहा हूँ। जिधर हमारा मन लगता है, उधर ही यह शक्ति बहने लगती है। सहस्त्रार की ओर वृत्ति को लगाने से जो शक्ति 'मूलाधार' में सक्रिय होकर वीर्य को स्खलित करने वाली थी, वही शक्ति उर्ध्वगामी बनकर आपको बचा लेगी।

परन्तु ध्यान रहे यदि आपका मन काम-विकार का मजा लेने मे अटक गया तो फिर आप सफल नहीं हो पायेंगे। थोड़े संकल्प और विवेक के सहारे आप कुछ ही दिखनों में देखेंगे कि इस प्रयोग से काम एक आंधी की तरह आया और कुछ ही क्षणों में शान्त हो गया।

(ब) जब भी काम का वेग उठे, फेफडों में भरी वायु को जोर से बाहर फेंको। जितना अधिक बाहर निकाल सको उतना उत्तम। फिर नाभि और पेट को भीतर की ओर खींची। दो तीन बार के बाद काम विकार शांत हो जायेगा और आप वीर्य पतन से बच जाओगे।

(स) वीर्य रक्षक चूर्ण : कुछ सूखे आँवलों से बीज अलग करके उनके छिलकों को कूटकर उसका चूर्ण बना लो। जितना चूर्ण हो, उससे दुगुनी मात्रा में मिश्री का चूर्ण उसमे मिला दो। यह चूर्ण रोज रात्रि को सोने से आधा घंटा पूर्व पानी के साथ एक चम्मच प्रयोग करें। यह चूर्ण वीर्य को पुष्ट करता है, कब्ज दूर करता है, वात-पित्त-कफ के दोश मिटाता है और संयम को मजबूत करता है।

(द) तुलसी का प्रयोग : प्रतिदिन सुबह सात तुलसी की पत्ती चबाकर खाली पेट पानी पीने से यह स्मृति शक्ति में वृद्धि करती है, ब्रह्मचर्य की रक्षा करती है। तुलसी एक उत्कृष्ट रसायन है। यह त्रिदोषनाशक है। रक्तचाप और पाचन तंत्र के नियमन में तथा मानसिक रोगों में तुलसी अत्यन्त लाभदायक है। यह रक्त विकार, वायु, खाँसी, कृमि, मलेरिया तथा अन्य प्रकार के बुखारों के साथ-साथ हृदय के लिए भी बहुत हितकारी है।

उपरोक्त सभी उपाय एवं प्रयोग अद्वितीय है। परन्तु विषय की अनुकूलता जानकर मैं अपने जीवन के उन तीन अति श्रेष्ठ उपायों की भी चर्चा करना भी अनिवार्य समझता हूँ जिनसे मुझे स्वास्थ्य सुधार में विशेष लाभ पहुँचा है। वे उपाय हैं प्राकृतिक चिकित्सा, युक्ति युक्त उपवास एवं ईश्वर का मानसिक रूप से निरन्तर जप। वैसे तो ये तीनों ही विषय बड़े ही विस्तृत हैं परन्तु मैं यहाँ इनको केवल सूचनार्थ सक्षिप्त टिप्पणी के रूप में आपके समक्ष रख रहा हूँ।

१. प्राकृतिक चिकित्सा : यह चिकित्सा पूर्णतः प्रकृति के पंच महा भूतों क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा अर्थात पृथ्वी (मिट्टी), जल, अग्नि, आकाश एवं वायु तत्व पर आधारित हैं। इसमें मनुष्य को अन्तःप्रकृति की चिकित्सा, बाह्य प्रकृति द्वारा निशुल्क प्रदान की जाती है।  

2. युक्ति युक्त उपवास : यह भी अपने आप में विलक्षण चिकित्सा है। इससे हम केवल शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक एवं आत्मिक चिकित्सा प्राप्त करते हैं। मैंने प्रत्यक्ष उपवास के द्वारा अनेको असाध्य रोगों की चिकित्सा होते देखी है तथा इसके अनेकों चमत्कार अपने जीवन में पाये हैं।

3. भगवद्नाम का सतत मानसिक जप : यह चिकित्सा तो 'दिव्य' है। यदि व्यक्ति मानसिक रूप से अपने खाली समय को अपने ''चहेते ईश्वरीय नाम' से भर दें तो उसकी धीरे-धीरे ऐसी परिस्थितियाँ हो जाती हैं कि उसका तन, मन व आत्मा इतनी शुद्ध एवं पवित्र होने लगती है कि उसमें सतत ईश्वर की अनन्त शक्ति विद्यमान होने के कारण उसके तीनों तापों दैहिक, दैविक, भौतिक का समूल नाश होने लगता है। और वह स्वयं ईश्वर रूप में परिणित हो जाता है। यही कारण है कि हमारे महान संत ईश्वर के समान ही पूज्य माने जाते हैं।

अतः आइये हम अपने को देवत्व की ओर ले चलें।

ॐ हरिः ॐ

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