इक्कीसवीं सदी बनाम उज्जव भविष्य भाग-1 - श्रीराम शर्मा आचार्य Ikkisveen Sadi Banam Ujjwal Bhavisya Bhag-1 - Hindi book by - Sriram Sharma Acharya
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आचार्य श्रीराम शर्मा >> इक्कीसवीं सदी बनाम उज्जव भविष्य भाग-1

इक्कीसवीं सदी बनाम उज्जव भविष्य भाग-1

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :60
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15494
आईएसबीएन :00000

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विज्ञान वरदान या अभिशाप

समाधान इस प्रकार भी संभव था


बुद्धि के धनी भी एक प्रकार के वैज्ञानिक हैं। शासन और समाज के विभिन्न तंत्र उन्हों के संकेतों तथा दबाव से चलते हैं यदि सामाजिकस कुरीतियों और वैयक्तिक अनाचारों के विरुद्ध ऐसी बाड़ बनाई गई होती, जो उनके लिए अवसर हो न छोड़ती, तो जो शक्ति बर्बादी में लगी हुई है, उसे सत्प्रयोजनों में नियोजित देखा जाता। अपराधों का, अनाचारों का कहीं दृश्य भी देखने को न मिलता। सर्वसाधारण को यदि औसत नागरिक स्तर का जीवनयापन करने की ही छूट रही होती, तो बढ़ी हुई गरीबी में से एक भी दृष्टिगोचर न होती। सब समानता और एकता का जीवन जी रहे होते। फिर न खाइयाँ खुदी दीखतीं और न टीले उठे होते। समतल भूमि में समुचित लाभ उठा सकने का अवसर हर किसी को मिला होता। तब इन शताब्दियों में हुई बौद्धिक और वैज्ञानिक प्रगति को हर कोई सराहता और उसके सदुपयोग से धरती का कण-कण धन्य हो गया होता।

नशेबाजी-दुर्व्यसनों के लिए छूट मिली होने के कारण ही लोग इन्हें अपनाते हैं। उनका प्रतिपादन ही निषिद्ध रहा होता, पीने वालों को प्रताड़ित किया जाता, तो आज धीमी आत्म हत्या करने के लिए किसी को भी उत्साहित न देखा जाता। इस लानत से बच जाने पर लोग शारीरिक और मानसिक दृष्टि से संतुलित रहे होते और हर प्रकार की बरबादी-बदनामी से बच जाते।

अन्यान्य दुर्व्यसनों से संबंधित इसी प्रकार के और भी अनेक ऐसे प्रचलन हैं, जो सामान्य जीवन में घुल मिल गए हैं। कामुकता भड़काने वाली दुष्प्रवृत्तियाँ फैशन का अंग बन गई हैं। बनाव, श्रृंगार, सज-धज के अनेक स्वरूप शान बनाने जैसे लगते हैं। आभूषणों में ढेरों धन बरबाद हो जाता है। बढ़ा हुआ बुद्धिवाद यदि इन अपव्ययों का विरोध करता, उनकी हानियाँ गले उतारता, तो खचॉली शादियाँ, जो हमें दरिद्र और बेईमान न रहतीं।

ऊपर चढ़ना धीमी गति से ही संभव हो पाता है, पर यदि पतन के गर्त में गिरना हो तो कुछ ही क्षणों में बहुत नीचे पहुँचा जा सकता है। पिछले दिनों हुआ भी यही है। चतुरता के नाम पर मूर्खता अपनाई गई है। इसका प्रमाण यह है कि ठाट-बाट की चकाचौंध सब ओर दीखते हुए भी मनुष्य बेतरह खोखला हो गया है। चिंता, उद्विग्नता, आशंका, अशाँति का माहोल भीतर और बाहर सब ओर बना हुआ है। किसी को चैन नहीं। कोई संतुष्ट नहीं दीखता। मानसिक दरिद्रता के रहते विस्तृत वैभव बेचैनी बढ़ने का निमित्त कारण बना हुआ है।

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