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आचार्य श्रीराम शर्मा >> गायत्री की गुप्त शक्तियाँ

गायत्री की गुप्त शक्तियाँ

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :60
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15485
आईएसबीएन :00000

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गायत्री मंत्र की गुप्त शक्तियों का तार्किक विश्लेेषण

गायत्री मंत्र के 24 देवता

 

गायत्री के तन्त्र ग्रन्थों में २४ गायत्रियों का वर्णन है। चौबीस देवताओं के लिए एक-एक गायत्री है। इस प्रकार २४ गायत्रियों द्वारा २४ देवताओं से सम्बन्ध स्थापित किया गया है।

गायत्री मंत्र के २४ अक्षरों में से प्रत्येक के देवता क्रमश: (१) गणेश (२) नृसिंह (३) विष्णु (४) शिव (५) कृष्ण (६) राधा (७) लक्ष्मी (८) अग्नि (९) इन्द्र (१०) सरस्वती (११) दुर्गा (१२) हनुमान् (१३) पृथ्वी (१४) सूर्य (१५) राम (१६) सीता (१७) चन्द्रमा (१८) यम (१९) ब्रह्मा (२०) वरुण (२१) नारायण (२२) हयग्रीव (२३) हंस (२४) तुलसी हैं।

यद्यपि इनमें से कई नामों के मनुष्य, अवतार, ग्रह, नक्षत्र, तत्व, पक्षी, वृक्ष आदि भी हुए और चरित्र भी उपलब्ध होते हैं, पर यहाँ स्मरण रखना चाहिए कि ऊपर जिन नामों का उल्लेख है उनका प्रयोग तन्त्र विज्ञान में विशुद्ध देव शक्तियों के रूप में होता है। इन देव शक्तियों की छाया लेकर मनुष्य ग्रह, तत्त्व, पक्षी, वृक्ष आदि जो हुए हैं वे इन शक्तियों के या तो स्थूल प्रतीक हैं या आलंकारिक विवेचन-हंस पक्षी, तुलसी का पौधा, सूर्य, चन्द्र, ग्रह, अग्नि, वरुण आदि तत्त्व, राम, कृष्ण, सीता, राधा, हनुमान् आदि अवतारी पुरुष उन देव शक्तियों के स्थूल प्रस्फुरण हैं। वस्तुत: वे शक्तियाँ अत्यन्त सूक्ष्म और ईश्वरीय सूर्य की किरणें हैं। २४ गायत्री द्वारा उन २४ किरणों से ही सान्निध्य स्थापित किया जाता है।

यह पहले ही बताया जा चुका है कि देवशक्तियाँ स्वचैतन्य हैं और अपनी मर्यादा में परमाणुओं, तत्वों, पदार्थों पर शासन करती हैं। इसलिए वे भौतिक और आत्मिक दोनों ही सत्ताओं से सम्पन्न हैं। देव-उपासना से मनुष्य को उस प्रकार के गुण प्राप्त होते हैं। साथ ही उनके शासन में रहने वाले पदार्थ भी उसी ओर खिंच-खिचकर जमा होते हैं। मधुमक्खियों के छते में एक शासक मक्खी होती है, वह जिधर चलती है उधर ही छते की अन्य सब मक्खियाँ चल देती हैं। जहाँ चुम्बक होता है, वहाँ लोहे के कण स्वयमेव खिंच आते हैं। शक्ति अपने आधार को अपनी ओर खींचती रहती है। जिस मनुष्य ने देव शक्ति की जितनी धारणा अपनी मनोभूमि में कर ली है, उसी अनुपात से उस शक्ति से सम्बन्धित परिस्थितियाँ एव वस्तुएँ उसकी ओर खिंचती चली आयेंगी और वह उपासना का समुचित लाभ प्राप्त करेगा।

गायत्री के चौबीस देवताओं की चैतन्य शक्तियाँ क्या हैं और उन शक्तियों के द्वारा क्या-क्या लाभ मिल सकते हैं? इसका विवरण नीचे दिया जाता है-

1. गणेश - सफलता शक्ति। फल- कठिन कामों में सफलता, विघ्नों का नाश, बुद्धि वृद्धि।

2. नृसिंह - पराक्रम शक्ति। फल- पुरुषार्थ, पराक्रम, वीरता, शत्रु नाश, आतंक, आक्रमण से रक्षा।

3. विष्णु - पालन शक्ति। फल- प्राणियों का पालन, आश्रितों की रक्षा, योग्यताओं की वृद्धि, रक्षा।

4. शिव - शिव शक्ति। फल- अनिष्ट का विनाश, कल्याण की वृद्धि, निश्चयता, आत्म-परायणता।

5. कृष्ण - योग शक्ति। फल- क्रियाशीलता, आत्म-निष्ठा, अनाशक्ति, कर्मयोग, सौन्दर्य, सरसता।

6. राधा - प्रेम शक्ति। फल- प्रेम दृष्टि, द्वेष-भाव की समाप्ति।

7. लक्ष्मी - धन शक्ति। फल- धन, पद, यश और भोग्य पदार्थों की प्राप्ति।

8. अग्नि - तेज शक्ति। फल- उष्णता, प्रकाश, शक्ति और सामथ्र्य की वृद्धि, प्रभावशाली, तेजस्वी होना।

9. इन्द्र - रक्षा शक्ति। फल- रोग, हिंसक, चोर, शत्रु, भूत-प्रेत अनिष्ट आदि आक्रमणों से रक्षा।

10. सरस्वती - बुद्धि शक्ति। फल- मेधा की वृद्धि, बुद्धि की पवित्रता, चतुरता, दूरदर्शिता, विवेकशीलता।

11. दुर्गा - दमन शक्ति। फल- विघ्रों पर विजय, दुष्टों का दमन, शत्रुओं का संहार, दर्प की प्रचण्डता।

12. हनुमान् - निष्ठा शक्ति। फल- कर्तव्य परायणता, निष्ठावान् विश्वासी, ब्रह्मचारी एवं निर्भय होना।

13. पृथ्वी - धारण शक्ति। फल- गम्भीरता, क्षमाशीलता, सहिष्णुता, दृढ़ता, धैर्य, भार-वाहन करने की क्षमता।

14. सूर्य - प्राण शक्ति। फल-निरोगता, दीर्घजीवन, विकास वृद्धि, उष्णता, विकारों का शोधन।

15. राम - मर्यादा शक्ति। फल-तितीक्षा, कष्ट में विचलित न होना, धर्म मर्यादा, सौम्यता, संयम मैत्री।

16. सीता – तप शक्ति। फल– निर्विकार, पवित्रता, मधुरता, सात्विकता, शील, नम्रता।

17. चन्द्रमा - शान्ति शक्ति। फल- उद्विग्रताओं की शक्ति, शोक, क्रोध, चिंता, प्रतिहिंसा आदि विक्षोभों का शमन, काम, लोभ, मोह एवं तृष्णा का निवारण, निराशा के स्थान पर आशा का संचार।

18. यम - काल शक्ति। फल- समय का सदुपयोग, मृत्यु से निर्भयता, निरालस्यता, स्फूर्ति, जागरूकता।

19. ब्रह्मा - उत्पादक शक्ति। फल- उत्पादक शक्ति की वृद्धि। वस्तुओं का उत्पादन बढ़ाना, सन्तान बढ़ाना, पशु, कृषि, वृक्ष, वनस्पति आदि में उत्पादन की मात्रा बढ़ना।

20. वरुण - रस शक्ति। फल- भावुकता, सरलता, कलाप्रियता, कवित्व, अलक्ष्या दूरोंकेलियों द्रवित होना, कोमलता, प्रसन्नता, माधुर्य सौन्दर्य।

21. नारायण - आदर्श शक्ति। फल-महत्त्वाकांक्षा, श्रेष्ठता, उच्च आकांक्षा, दिव्य गुण, दिव्य स्वभाव, उज्ज्वल चरित्र, पथ-प्रदर्शक कार्य-शैली।

22. हयग्रीव - साहस शक्ति। फल–उत्साह, साहस, वीरता, शूरता, निर्भयता, कठिनाइयों से लड़ने की अभिलाषा, पुरुषार्थ।

23. हंस - विवेक शक्ति। फल- उज्ज्वल कीर्ति, आत्म-संतोष, सत्-असत् निर्णय, दूरदर्शिता, सत्संगति, उत्तम आहार-विहार।

24. तुलसी - सेवा शक्ति। फल-सेवा में प्रवृत्ति, सत्त्व प्रधानता, पतिव्रत, पत्नीव्रत, आत्म-शान्ति, परदु:ख निवारण।

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