गायत्री का ब्रह्मवर्चस - श्रीराम शर्मा आचार्य Gayatri Ka Brahmvarchas - Hindi book by - Sriram Sharma Acharya
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आचार्य श्रीराम शर्मा >> गायत्री का ब्रह्मवर्चस

गायत्री का ब्रह्मवर्चस

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :60
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15481
आईएसबीएन :00000

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गायत्री और सावित्री उपासना

 

प्रतिभाओं की ढलाई का समर्थ सयंत्र

युग सृजन की महान प्रक्रिया में अग्रिम मोर्चा सम्भालने वालों में कुछ विशिष्ट क्षमता होनी चाहिए। उनमें सामान्य से अधिक ऊँचे स्तर की असामान्य प्रतिभा रहनी चाहिए। अन्यथा नव निर्माण में जिस प्रतिभा की आवश्यकता होती है उसके जुट न पाने से प्रगति पथ आगे बढ़ नहीं सकेगा। अग्रगामियों को सदा अतिरिक्त साहसिकता और विशिष्ट सूझ-बूझ का परिचय देना पड़ता है। अनुगमन और अनुशरण के लिए तो अनेकों को आसानी से तैयार किया जा सकता है। बहते हुए प्रवाह में तो तिनकों से लेकर हाथी तक को बहते देखा जा सकता है। कठिनाई प्रवाह का अवतरण करने और उसे उपयोगी दिशा में मोड़ने वाले मनस्वी भागीरथों को आवश्यकता के अनुरुप उत्पन्न करने की होती है। नव निर्माण के प्रथम चरण में ऐसी ही प्रतिभाओं की आवश्यकता पड़ेगी, उस दिशा में उपयुक्त आधार मौजूद हो और उपयुक्त साधन बनते जाँय तो अनुयायियों की, सहकर्मियों की कमी नहीं रहती।

सैनिकों और सेनापतियों के बीच काम करने और शरीर सज्जा में बहुत थोड़ा सा ही अन्तर होता है। डाक्टरों से ज्यादा सक्रिय कम्पाउण्डरों और नसों को देखा जा सकता है। इंजीनियर योजना बनाते हैं और कारीगर इमारत खड़ी कर देते हैं। न्यायधीश फैसला करते हैं और उनका निर्देश पालन करने के लिए पुलिस जेल आदि के अनेकों कर्मचारी जुट पडते हैं। शासनाध्यक्षों के निर्णय को पूरा करने में विशालकाय सरकारी तन्त्र को अपनी सारी शक्ति झोंकनी पड़ती है। कारखाने के मालिक, मैनेजर योजना बनाते हैं और उसे पूरा करने वाले हजारों श्रमिक लगाये रहते हैं।

युग सृजन में रीछ बानरों की सेना का होना ही पर्याप्त नहीं था। उनमें नल नील को अंगद हनुमान को अग्रिम पंक्ति में खड़ा होना था। महाभारत में लाखों योद्धा लड़े थे पर उनका नेतृत्व कुछेक सेनापतियों को ही करना पड़ा था। सत्यागृहियों में से प्रत्येक देश भक्त की प्रशंसा की जायगी उनमें गांधी, नेहरू, पटेल जैसे उत्कृष्ट नेतृत्व का अभाव रहा होता तो संख्या बल होने पर भी सफलता संदिग्ध रह सकती थी। कथाकार अगणित हैं पर, बाल्मीकि व्यास जैसे सृजेता तो उँगलियों पर ही गिने जा सकते हैं। चिकित्सकों की संख्या ही जन सवास्थ्य का संरक्षण करती है पर उन पद्धतियों के निर्माण कर्ता चरक सुश्रुत जैसे मूर्धन्य ही उस परम्परा के कर्णधार रहे हैं। गंगा का लाभ असंख्य जीवितों और मृतकों को मिलता है पर उसका अवतरण भागीरथी प्रयत्न से ही सम्भव हो सका। लेखक थोड़े होते हैं, प्रकाशक मुद्रक विक्रेता पाठक अगणित। अभिनेता थोड़े हैं और दर्शक अधिक। रेल में संचालक थोड़े होते हैं पर यात्री अनेकों। संख्याबल के महत्व को अमान्य नहीं किया जा सकता। किन्तु अग्रम पंक्ति में खड़े होने वाले नेतृत्व के बिना संसार में वैसी ही रिक्तता छाने लगेगी जैसी कि आकाश में सूर्य चन्द्र जैसी प्रतिभाएँ छिन जाने पर हो सकती है। सौर मण्डल में सूर्य का, परमाणु में नाभिक का अपना स्थान है। उस मूल सत्ता के बिना बाहरी ढाँचा यथावत् खड़ा रहने पर भी वह निर्जीव ढकोसला भात्र रह जायगा।

जन मानस का परिष्कार अपने युग की महती आवश्यकता है। धर्मतन्त्र से लोक शिक्षण की विशाल काय योजना उसी के निमित्त बनाई गई है यह पराक्रम अपने ढरें पर अपने ढंग से निर्धारित योजना के अनुरूप चल रहा है। पर एक तरफ अभी भी जहाँ का तहाँ खड़ा है कि युग नेतृत्व कर सकने वाली प्रतिभाओं का निर्माण वैसे ही है। यह बड़ा काम है। हीरे की अपनी निजी विशिष्टता भी होनी चाहिए और जौहरी की सूझ-बूझ तथा खरादी की कुशलता भी, यह सारा समन्वय ही हीरे को उपयुक्त स्थान प्रदान कर सकता है। पारा अपने आप में एक रसायन है पर उसे मकरध्वज जैसी जीवनमूरि बनाने वाली प्रक्रिया का भी मूल्यांकन करना होगा। पारस के संदर्भ में कहा जाता है कि उससे छूकर लोहे की शिलाएँ स्वर्ण राशि में बदल जाती हैं। चन्दन की प्रखरता समीपवर्ती औरों को सुवासित करतीं हैं। स्वाँति बूंदें सोप के कलेवर में मोती उत्पन्न करती हैं। चुम्बक अपने अनेकों सजातीयों को अपने निकट खींचता चला जाता है। इन उदाहरणों से एक ही निष्कर्ष निकलता है कि प्रतिभाएँ अग्रिम पंक्ति में खड़ी होती हैं और सम्पर्क क्षेत्र की अपनी विशिष्टताओं से प्रभावित करती हैं।

यहाँ यह चर्चा इस सम्बन्ध में की जा रही है कि युग सृजन के महान अभियान में दूरदर्शों निर्धारण, सुसन्तुलित क्रियान्वयन, उसके लिए जन सहयोग उपयुक्त साधन आदि का जितना महत्व है, लगभग उतना ही महत्व उन प्रतिभाओं का है जो लोक नायकों की भूमिका निभाने में अपनी उपयुक्तता सिद्ध कर सकें। अनुपयुक्त नेतृत्व से जितनी हानि होती है उसकी कल्पना मात्र से कलेजा दहलने लगता है। इन दिनों राजनैतिक क्षेत्र के नेतृत्व में जिस अनुपयुक्तता का साम्राज्य है उसे देखते हुए लगता है कि आजादी पा लेने पर भी प्रगति के दिन अभी दूर हैं। जिन देशों को यह सौभाग्य मिल गया है वे कुछ ही वर्षों में कहीं से कहीं जा पहुँचे और हम बगलें झाँक रहे हैं। यही बात धर्म क्षेत्र के सम्बन्ध में भी है। उसमें उपयुक्त नेतृत्व कर सकने वाली क्षमताएँ रहीं होती तो बुद्ध, गाँधी, समर्थ रामदास, विवेकानन्द, गुरु गोविन्द सिंह जैसे क्रान्तिकारी परिवर्तन प्रस्तुत करने में कोई कठिनाई न रहती। साहित्य क्षेत्र 'में रोम्या रोला, टालस्टाय, रस्किन, माक्र्स, रूसो, वनांडशे जैसे मात्र उद्देश्य के लिए लिखने वाली प्राणवन्त प्रतिभाओं की कमी न पड़ी होती तो लोक मानस को पतन और पराभव के इस कीचड़ में न सड़ना पड़ता।

नेतृत्व करने के लिए लालायित तो असंख्यों हैं और उनमें मिलने वाले श्रेय को देखकर ललकते भी कितने ही हैं। घुसपैठ के लिए छद्म वेशियों की दुरभि संधियाँ भी देखते ही बनती है। इस विडम्बना की जन साधारण को भी धीरे-धीरे जानकारी मिल रही है और उन नेताओं की अभिनेताओं की श्रेणी में गणना होने लगी है। यह आस्था संकट इतना भयानक है कि अगले दिनों लोक मानस को प्रभावित करने और नव सृजन जैसे आदर्शवादी कार्यों के लिए उपयुक्त प्रतिभाओं का वर्ग ही समाप्त हो जायगा। तब जन साधारण को समझाया और सिखाया कुछ भी जाता रहे, किसी आदर्शवाद के लिए त्याग बलिदान के लिए साहसिकता प्रदर्शित करने वालों का ढूंढ़ सकना कठिन हो जायगा। सार्वजनिक जीवन की इसे अपार क्षति कह सकते हैं।

नवयुग के शुभारम्भ की इस पुण्य बेला में जिन औजार उपकरणों से सूजन प्रक्रिया आरम्भ करनी है, पहिले उन्हीं को देखना और सही करना होगा। जों औजार हाथ में हैं वे सही होने चाहिए। उन्हें बनाते समय भी यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि उत्कृष्टता में किसी प्रकार की कमी न पड़ने पाये।

सफलताएँ चाहे आर्थिक हों अथवा श्रेय सम्मान पाने की। वे अनायास ही किसी को नहीं मिलतीं। उनके लिए योग्यता बढ़ाने, पुरुषार्थ करने, साधन जुटाने और सहयोग पाने के कई आधार खड़े करने होते हैं। इन्हें आतंकवादी तरीकों से नहीं उगाया कमाया जा सकता है। इसके लिए आर्थिक प्रयास, एवं अटूट साहस की आवश्यकता होती है। ऐसा हर किसी से नहीं बन पड़ता। उसके लिए सुसंस्कारिता की आवश्यकता है। प्रतिभा इसी को कहते हैं। सफलता के लिए वही मूल्य चुकाना पड़ता है। जो असमर्थ होते हैं वे हाथ मलते रह जाते हैं।

प्रगति एवं सुव्यवस्था के लिए साधनों की, शिक्षा की अनुकूलता की उतनी आवश्यकता नहीं जितनी उत्कृष्ठ दृष्टिकोंण सज्जनोचित व्यवहार पर आधारित सुसंस्कारिता की। जिनमें यह विशिष्टतायें होंगी उन्ही के लिए देश समाज, धर्म, संस्कृति आदि की कोई ठोस सेवा कर सकना सम्भव होता है।

उत्कृष्ट व्यक्तित्व के धनी ही ऐसा कुछ कर पाते हैं जिसे चिरकाल तक कृतज्ञता पूर्वक स्मरण किया जाता रहे। समस्याओं के समाधान और सुखद सम्भावनाओं के निर्माण में भारी भरकम व्यक्तित्व ही आगे आते हैं। उन्हीं के पराक्रमों से वातावरण बनता है। हवा चलती और तूफान उठता है। बाढ़ रोकने, बाँध बाँधने, विग्रह को उलटने में उन्हीं की प्रतिभा काम देती है। समुद्र छलाँगने और पर्वत उठाने जैसे महान कार्य ओछे व्यक्ति नहीं कर सकते, उसके लिए भी बजरंग बली जैसी ओजस्विता, तेजस्विता, मनस्विता होनी चाहिए यह विभूतियाँ कहीं बाहर से नहीं मिलतीं। हर किसी को भीतर से ही उगानी पड़ती हैं।

यही है मानव जीवन का परम सौभाग्य, जिसे आत्म निर्माण एवं आत्म परिष्कार कहा जा सकता है। जिसने इस दिशा में जितनी प्रगति की समझना चाहिए कि उसने उतनी ही मात्रा में सुखद वर्तमान और उज्ज्वल भविष्य का सार सिद्धान्त और अमोघ वरदान प्राप्त कर लिया। यह उपलब्धियाँ कभी-कभी पूर्व संचित संस्कारों की पूँजी के रूप में किसी-किसी को अनायास ही उपलब्ध होतों, उभर कर ऊपर आती देखी गई हैं। पर यह अपवाद है, क्रम विधान नहीं। इसी प्रकार किन्हीं सत्पात्रों को सत्प्रयोजनों के लिए कोई सिद्ध पुरुष अपना अधिकार भी हस्तान्तरित कर जाते हैं, यह भी अपवाद ही है। सामान्य क्रम स्वालम्बन, स्वउपार्जित ही है। आत्मसाधना ही इसका एक मात्र उपाय है। आत्मबल ही सबसे बड़ा बल है। धनबल, बुद्धिबल, बाहुबल के सहारे समृद्धि स्तर की सफलताएँ मिलती हैं। आत्मबल इन सबसे उपर है। उसके सहारे व्यक्तित्व बजनदार बनता है और इसी आधार पर मनुष्य की गरिमा का मूल्यांकन होता है।

प्राचीन काल से यह भारत भूमि नर रत्नों की खदान रही है। इसकी स्थिति अनायास ही ऐसी नहीं बनी। इसके लिए तत्वज्ञानियों को आत्म निर्माण की गरिम जन-जन को समझानी पड़ी है। और उन्हें उसकी उपलब्धि का मूल्य चुकाने के लिए साधना, पुरुषार्थ करने के लिए सहमत करना पड़ा है। गुरुकुलों, आरण्यकों में यही उपक्रम चलता था। लौह शानिक कारखाने कच्चे लोहे को पकाने और ढालने की विधि व्यवस्था ते हैं। फलत: उनमें प्रवेश करने वाला कच्चा लोहा जब पकने, गलने, ढलने की कष्ट साध्य प्रक्रिया को पूरा करके बाहर निकलता है तो उसका होता है।

भवन कारखाने बनाने होते तो, धन के आधार पर मिल सकने वाले उपकरण बनाये जुटाये जा सकते थे। वह सरल था। किन्तु अपना सूजन तो भावात्मक है। उसमें कोटि-कोटि मानवों के चिन्तन में उत्कृष्टता और आचरण में शालीनता का उत्पादन अभिवर्धन किया जाता है। सूजनात्मक सत्प्रवृत्तियों और सद्भावनाओं को लोक व्यवहार में सम्मिलित करना है। यह अत्यधिक कठिन काम है। इसके लिए ऐसी प्राणवान प्रतिभाओं की आवश्यकता पड़ेगी जो चरित्र और साहस से परिपूर्ण हों। सेवा और उदारता जिनमें कूट-कूट कर भरी हो।

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