गीले पंख - रामानन्द दोषी Geeley Pankh - Hindi book by - Ramanand Doshi
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गीले पंख

रामानन्द दोषी

प्रकाशक : आत्माराम एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 1959
पृष्ठ :90
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15462
आईएसबीएन :0

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5 पाठक हैं

श्री रामानन्द 'दोषी' के काव्य-संग्रह ‘गीले पंख' में 33 कविताएं हैं…


16

वह भी सच था, यह भी सच है !

 
आज बीच मझधार खड़ा मैं सोच रहा हूँ,
वह भी सच था, यह भी सच है !

एक रोज़ मेरे आँगन में पर फैलाए,
सपनों के कलहंस कहीं से तिरते आए;
मैं ने अन्तर का सब नेह उँडेला उन पर -
लेकिन जब छूना चाहा, वे हाथ न भाए;
मेरी पीड़ा ने मेरा अन्तर मथ डाला,
और मिला चलने को पथ यह काँटों वाला,
काँटों से पाँवों की लेकिन प्रीत हुई जब,
मेरी बाधा ही मेरा पथ-गीत हुई जब,
तब फिर मुझ को छलने आए स्वप्न सहज सुकुमार!
खड़ा मैं सोच रहा हूँ, वह भी सच था, यह भी सच है!

तुम को शायद याद न होगी बीते कल की,
थी मेरी हर साँस टेर चातक घायल की;
नवधा भक्ति-भरी मेरे प्राणों की गागर -
शत-शत धाराओं में इन चरणों पर ढलकी;
लेकिन तुम ने एक बार भी अपने कर से,
मेरी श्रद्धा के प्रसून के गाल न परसे !
मैं ने सारे विष को पी कर अपने मन में,
सोच लिया, यह भी होना था इस जीवन में,
वही मगर तुम आज खोजते आए मेरा द्वार !
खड़ा मैं सोच रहा हूँ, वह भी सच था, यह भी सच है!

नौका ने उत्ताल तरंगों से घबरा कर,
लाख-लाख तट से विनती की हा-हा खा कर;
लेकिन तट ने बार-बार उस को ठुकराया -
कोटि-कोटि व्यंग्यों की भाषा में मुसका कर;
जब कोई बे-आस सहारा हो जाता है,
संघर्षों से लड़ना भी आ ही जाता है;
अखिर लहरों ने नौका को गोद उठाया,
भंवरों ने स्वागत में मंगल-गान सुनाया,
और मिलन-आलिंगन आतुर है हर कूल किनारे
खड़ा मैं सोच रहा हूँ, वह भी सच था, यह भी सच है

इस पथ के हर राही का विश्वास अलग है,
सब का अपना प्याला, अपनी प्यास अलग है;
जीवन के चौराहे खंडहर पर मिलते हैं -
पतझर सब का एक, महज़ मधुमास अलग है;
यों तो इस अम्बर से अविरल मधु झरता है,
लेकिन, प्याला किसी-किसी का ही भरता है;
मेरा पूर्ण चषक पतझारों ने उलटाया,
आखिर मैं ने अपनी तृष्णा को समझाया,
आज मगर मधुभीगे-भीगे हो पाए पतझार !
खड़ा मैं सोच रहा हूँ, वह भी सच था, यह भी सच है!

कलियों का अपने ही दिल पर राज न होता,
केवल भूत-भविष्यत होता, आज न होता;
सच कहता हूँ बहुत ठोकरें खाती दुनिया -
अगर प्यार का रूप कहीं मोहताज न होता;
उसी प्यार को लेकिन गुंजलिका में कस कर
उस दिन रूप हँसा था भोलेपन से डस कर,
दबी-दबी आहों की तब जुड़ पाईं लड़ियां,
छन्द-सूत्र में पिरी, बनीं गीतों की कड़ियाँ;
रूप उन्हीं गीतों का बन कर आया पहरेदार !
खड़ा मैं सोच रहा हूँ, वह भी सच था, यह भी सच है।

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