काल का प्रहार - आशापूर्णा देवी Kaal Ka Prahar - Hindi book by - Ashapurna Devi
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काल का प्रहार

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : गंगा प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :64
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15412
आईएसबीएन :000

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आशापूर्णा देवी का एक श्रेष्ठ उपन्यास

14

अचिन्तय की चिन्ता किसी ने नहीं की जो दलूमौसी से मुश्किल से चार-पाँच वर्ष बड़ा था। पढ़ाई का कीड़ा और जो दलूमौसी का परम प्रिय पात्र बन गया। तभी तो उसे हीरे का पात्र मान वह आत्मसमपर्ण कर बैठीं। पर घर वालों ने तो उसे पात्र की मर्यादा ना दी।

पर दलूमौसी को कैसे संयोग मिला था? इधर तो कहती थी सात सौ चक्षु उन्हें चारों ओर से कैद किये रहते थे। जो कुटिल, तीखे और सतर्क थे।

पूँटी ही केवल आँखें बन्द करके रहती पर बाकी हेमन्त और वसन्त की बीवियाँ, चार चक्षु की अधिकारिणी और उनकी दो एक बेटियाँ जो समय पूर्व ही झानू बन गई थी। सर्वोपरि तो अचिन्तय जननी-उनकी एक आँख में नासूर था फिर भी एक आँख से बाहरी लड़की की बेचाल उनसे कैसे छिप सकता?

सब था। पर किसी तरह किसी की चिन्ता से परे उन्हें दुर्लभ-सुवर्ण अवसर मिला जब दलूमौसी ने उस हीरे के पात्र में नैवैद्य प्रदान कर डाला।

हाँ उन किताबों से भरी अलमारियों की चाभी उनके आँचल में ना आकर भी उसी सीमा तक पहुँच गई। उस अल्मारी के अधिकारी ने उसे ललित कहनी शुरू कर दिया।

तत्पश्चात तो वही ऐतिहासिक प्रतिज्ञा-जान दे देंगे पर अपने वचन पर कायम रहेंगे।

मेरी एक वाचाल पोती ने मेरी पिटारी में संभाल कर रखी ‘श्रीमती शतदलवासिनी देवी की काव्य मलिका' वाली पुस्तक निकाल कर पढ़ते-पढ़ते लोटपोट होती-होती बोली-तुम्हारे युग के हिसाब से तो काफी साहसिका थी। हर पंक्ति में प्रेम की गंगा बहती दिखाई दे रही है। यह देख तुम्हारे दादा विचलित नहीं होते तो क्या करते?

पर उस प्रतिज्ञा का क्या हुआ?

वह तो बहुत बड़ी कथा है।

आहा तुम्हारी प्राण प्रतिभा दलूमौसी की जीवन गाथा सुनाओ ना।

एक हिसाब से तो सुनने के काबिल तो है।

पर वही दलूमौसी ने स्वेच्छा से अपने को बलि के लिए प्रस्तुत किया। हाँ शेष विदा ले ली थी।

क्यों कैसे?

बताने लगें तो पूरी महाभारत की कथा बन जायगी। और तुम भी सुनकर हिचकी लेना शुरू कर दोगी।

बात यों हुई कि घटकी द्वारा एक प्राणनाशक तथ्य से दलूमौसी का सामना हुआ। वह तथ्य गोपनीय था पर बड़े परिवार में गोपनीय तथ्य भी बाहर आ जाता है। उस रचना के फलस्वरूप दलूमौसी को पता चला कि उनके लिए ऐसे वर की खोज हो रही है जो अपनी जन्मपत्रिका के साथ पत्नी वियोग का संवाद लेकर आया है। वह क्या?

मतलब ब्याह के बाद पत्नी की मृत्यु अनिवार्य।

आहा क्या फालतू बकवास कर रही हो? ऐसा वर भी ढूढ़ते हैं?

हो रहा था रे। क्योंकि दलूमौसी की जन्मपत्रिका में भी तो वैधव्य योग था। शादी के एक बरस बाद वर का संसार त्याग।

ही-ही तुम यह सब मानते थे?

हम माने या ना माने पर अभिभावक गण तो मानते थे। अब भी मानते हैं। अरे बाबा अब भी लोग, जन्मपत्री सभी मानते हैं। कुछ ज्यादा ही मानते हैं । तेरी एमबी० बी०एस डॉक्टर भाभी जरूर नहीं मानती? अपने लड़के को सामने नहीं खिलाती, सुन्दर से सजाती भी नहीं। तभी भी मानते थे। इस पृष्टभूमि में दलूमौसी से क्या लीक से हटकर थीं? उन्होंने भी मन पक्का कर डाला। |

हमसे बोलीं-अपने लिए मैं उसके प्राणों की बलि नहीं चढ़ने देंगी। उसे कह दिया विधाता को ही हमारा मिलना मंजूर नहीं है। बीच से तुम्हारे प्राणों को बचा हूँ।

वह बोला था-मैं इन सबमें विश्वास नहीं करता। मैंने भी कहा-मैं भी ज्यादा तो विश्वास नहीं करती पर अविश्वास-विश्वास के भवर में तुम्हें क्यों डालूं?

उसने मुझे निष्ठुर, पाषाणी कहा-अगर सब कुछ कोष्टी के हिसाब . से है तो क्या सहयरण सम्भव नहीं है? देखा उसका पागलपन। ऐसा क्यों

सोचते हो। मैं तो ऐसा करती हैं। पर अपनी माँ को तो सोचो उनके प्राणों को कितना कष्ट होगा। तब वह चुप हो गया। पर उसने भी ब्याह ना करने की प्रतिज्ञा कर डाली।

मैंने भी उसे भीष्म प्रतिज्ञा ना करने का उपदेश दिया। पर मन में पुत्रक तो जागा ही। पर अपनी प्रतिज्ञा रख पायेगा? संसार के पाँच जनो के आगे उसकी प्रतिज्ञा धरी रह जायेगी।

मुझे ही देख एक ज्योतिषी ने आकर सब गड़बड़ कर डाला। उसे देख श्रद्धा तो नहीं आती। पर उसकी गणना फली तो ठीक है अगर ना फले तो?

हतभागे ने मुझे इंस वचन से बाँध दिया कि मैं कभी भी आत्महत्या को ख्याल भी ना लाऊँ। अगर मैं करती हूँ तो वह भी ट्राम लाइन के नीचे आकर अपना गला कटवा लेगा। देखो क्या होता है? बुआ के गोपाल से प्रार्थना तो की है ज्योतिषी की बात फल जाये।

इसी पृष्ठभूमि में सझले दादा की प्यारी बेटी (ज्येष्ठ) शतदलवासिनी का ब्याह घूमधाम, गाजे-बाजे के साथ सम्पन्न हो गया। उसकी सुसराले वाल काफी अमीर थे। वर चार घोड़ी की बग्घी, वैगपाईप बैन्ड के साथ आया और ऐसटिलन की रोशनी बरातियों के साथ थी।

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