चश्में बदल जाते हैं - आशापूर्णा देवी Chasme Badal Jate Hain - Hindi book by - Ashapurna Devi
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चश्में बदल जाते हैं

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : सन्मार्ग प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2000
पृष्ठ :103
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15408
आईएसबीएन :0000000000

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बाप बेटा को समझाना चाहता है कि युग बदल गया है-तुम्हारा चश्मा बदलना जरूरी है। वृद्ध पिता के चेहरे पर हँसी बिखर जाती है।

13

असल में जॉगिंग करने के लिए वह खूब तड़के उठता है। तब भी, सुबह छह, साढ़े छह बजे तक किसी को शक नहीं हुआ था। सोचा था कि आकर लेट गया होगा-जाने दो, बुलाने की जरूरत नहीं है।

लेकिन थोड़ी देर बाद डर लगा कि बाद में उठकर जब देखेगा कि दिन चढ़ आया है तो कहेगा 'जगाया क्यों नहीं?' नाराज़ होगा। इसीलिए बुलाने आए। आश्चर्यचकित हुए यह देखकर कि कमरा भीतर से बन्द था। वह तो कभी भीतर से कमरा बन्द नहीं करता है?

अतएव बुलाना शुरु हुआ। फिर दरवाज़ा पीटना, ढेलना। यहाँ तक कि दरवाज़े पर हथौड़ी भी पीटी।

कोई आवाज़ नहीं।

बस, डर के मारे तो सबकी जान सूख गई। घर में रोना-धोना मच गया पर खुद दरवाज़ा तोड़ने की हिम्मत नहीं जुटा सके। अतएव कातर होकर पुलिस बुलाई गई।

परन्तु पुलिस आई तो?

आदमी लगाकर दरवाजा तोड़कर वीरविक्रम भाव से भीतर घुसी तो? देखा, कमरे में से सामान नदारद। शून्य। बिस्तर भी शून्य।

सिर्फ बिस्तर पर किताब से दबाकर रखा था वही 'नोट'।

'सिनेमा के लाइन में जाने पर पिताजी मुझे त्याग देंगे, यह उन्होंने घोषणा कर रखी है-अतएव मुझे अवश्य ही ढूँढ़ेगे नहीं। निश्चिन्त मन से मैं अपने लक्ष्यपथ पर चला। साथ में पथ का पाथेय रहेगा मामदू का स्नेह भरा दान। भविष्य में जब 'उज्ज्वल नक्षत्र' बनकर आकाश में चमकने लगूँगा, लोग तुमलोगों की पदधुलि लेने दौड़े आयेंगे, मेरे माता पिता हैं जानकर-तब अगर हो सके तो क्षमा करना।

तुम लोगों का अभागा पुत्र

उदय


इस उम्र में बातों की बुनावट देखो। 'पथ का पाथेय' है मामदू का स्नेह भरा दान। क्या इससे साफ-साफ समझ में नहीं आ रहा है किसने हिम्मत और धन जुटाया है?

सोमप्रकाश ने दूसरा सवाल उठाया। वह सवाल था 'एक दरवाज़े वाले कमरे' का दरवाज़ा जब भीतर से बन्द था तो वह 'हवा' हुआ कैसे?'

ओः, वह भी एक रहस्य है।

यद्यपि उस रहस्य के जानकार सभी थे? लेकिन मुसीबत आ पड़े तो क्या ये बातें याद रहती हैं?...अगर याद आ जाती तो क्या पुलिस बुलाते? उससे दरवाज़ा तुड़वाने की क्या जरूरत थी?

असल में दरवाज़े में भीतर से दो चिटकनियाँ लगती हैं जिसमें से नीचे वाली ढीली हो गई है। काफी दिनों से। उस चिटकनी का सिरा अगर सीधा रहा और हवा तेज़ चली, अथवा किसी ने पल्ला छू दिया या हवा से पल्ला खुद ही भाग आया और धड़ाम होते ही चिटकनी गिर जाती है। गिर गई और उसे फर्श पर बना छेद मिल गया तो फिर कहना क्या है? उसमें घुसकर बैठ जाती है। तब बाहर से कच्छी चिमटा, बुनाई वाली सलाइयाँ वगैरह वगैरह की मदद से, काफी पापड़ बेलने के बाद खोला जाता था। उसी चालाकी का सहारा लिया था लड़के ने। चिटकनी का सिरा सीधा रखकर, बाहर आकर पल्ला खींच दिया था। बस...खिसक लिया होगा।

दामाद लगभग उछलकूद कर बोले-'आप क्या जानते हैं कि ऐसी मानसिक दशा में पुलिस दरवाज़ा तोड़कर भीतर जाकर उस लटकती मृतदेह, या नींद की गोलियाँ खाकर बिस्तर पर ऐंठी पड़ी देह, न पाकर हमें क्या कहकर धमका गई है? कह गई है उन्हें वृथा ही हैरेस करने की सज़ा वे हमें दिलवाकर रहेंगे।'

शीतल दृष्टि से दामाद की ओर देखते हुए सोमप्रकाश ने पूछा-'वृथा हैरेस करने के लिए धमकी दे गए हैं?'

'जी हाँ दे गए हैं। कहते क्या है कि जब आपको दरवाज़ा खोलने की कला कौशल आती थी तब उसकी कोशिश न करके दरवाज़ा क्यों तुड़वाया?'

'हूँ...बिल्कुल ठीक।' कहकर सोमप्रकाश थोड़ी देर तक दामाद को देखते रहे फिर शीतल दृष्टि को बनाए रखते हुए, शीतलतम स्वरों में पूछ बैठे-'अच्छा अभिमन्यु, ढीली चिटकनी बदल डालने में मानता हूँ पैसे खर्च होते लेकिन नीचे का वह छेद तो बालू मिट्टी वगैरह भर कर रखते तो आज इतना सारा पैसा न खर्च होता।'

'क्या कहना चाहते हैं आप?' शेर सा दहाड़ने वाला दामाद मूर्खों की तरह देखकर उनकी बात को दोहरा बैठा-'बालू मिट्टी से? गड्ढे को?'

'हाँ, आज अगर गड्डा बन्द होता तो इतना झंझट न होता।'

'ओ:, उधर ध्यान नहीं गया कभी।'

अब दामाद निरुत्तर। 'पैसे खर्च' ने शरीर में चुभन पैदा कर दी थी।

पर यह बात भी सच है। पाँव फँसकर गिर जाने वाले सम्भव्य गड्ढों को बन्द या भरवाने का ध्यान कितनों को रहता है? कब कौन करता है? बस चलते वक्त गड्ढे के लिए असन्तोष प्रकट करेंगे और उसमें गिरकर पैर टूट जाने पर 'हाय हाय' करेंगे।'

इनकी यह चिटकनी इसकी प्रतीक मात्र है।

चलायमान इस नाटकीय दृश्य पर यही यवनिका गिरना था।

कुछ दामाद अपनी पत्नी को साथ लेकर जाते जाते 'इस घर का चौखट पार न करूँगा' कहकर निकलता और पर्दा गिर जाता।

ऐसे नाटकों में यही होता है।

लेकिन वास्तव में ऐसा हुआ नहीं।

नाटक का शर्त भंग हुआ-आत्म-मर्यादा-बोधहीन सुकुमारी के अन्यान्य असाधारण परिश्रमों के ज़ोर पर। अतएव दृश्य थोड़ी देर तक और खिंचा। ये दृश्य था डाइनिंगरूम का। मेज़ पर सुकुमारी के दामाद और लड़की उनके सामने ढेरों खाद्य सामग्री सजाई हुई। और सुकुमारी बार-बार कह रही हैं-'नहीं, नहीं, कुछ भी ज़्यादा नहीं है। सब खाना पड़ेगा। सुबह से तो कुछ भी पेट में नहीं गया है।...तू उदास न हो सूनी। देखना, रुपया खत्म होते ही और शौक़ का नशा उतरते ही, घर का लड़का ठीक घर वापस आ जायेगा। माँ-बाप, भाई-बहन, ताऊ-ताई, दादी-सबको छोड़कर क्या हमेशा के लिए बाहर रह सकता है कोई?'

अपने लोगों का नाम तक न लिया। जब प्रधान पाप के पापी खुद ही हैं। लड़की ने मलिन मुख से कहा-'उसके मन में इतनी माया नहीं है।'

'तू भी क्या कहती है? मर्द आदमी है। अपने भीतर की माया-ममता जल्दी प्रकट नहीं करते हैं।...और फिर...अभी तो कह रहा था कि गूँगे-बहरे का रोल मिला है, हिन्दी न जानने से भी काम चलेगा। बाद में? दुर! देखना, ठीक लौट आयेगा।'

लड़की हिल्सा मछली के झोल से चावल सानते हुए धीमे से बोली-'पिताजी नहीं खायेंगे?'

सुकुमारी साफ-साफ बोलीं-'उनकी बात छोड़। वह यह सब खाते हैं क्या? ज़रा-सा स्टू और हाथ की बनी दो पतली रोटी-यही तो उनका खाना है। वह अपनी उन्हें उनके कमरे में पहले ही खिला चुका है।'

दो हृदय से पत्थर का बोझ उतर गया।

जान बची-उस शीतल दृष्टि का सामना तो न करना पड़ेगा।

*                    *                      *

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