चैत की दोपहर में - आशापूर्णा देवी Chait Ki Dopahar Mein - Hindi book by - Ashapurna Devi
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चैत की दोपहर में

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : सन्मार्ग प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :88
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15407
आईएसबीएन :0000000000

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चैत की दोपहर में नारी की ईर्ष्या भावना, अधिकार लिप्सा तथा नैसर्गिक संवेदना का चित्रण है।...

9

यह सच है कि अरण्य के बड़े मामा के उस लड़के की शादी जात-गोत्र के अनुसार नहीं हुई थी, गृहस्वामी इस शादी के लिए कतई सहमत नहीं थे। लड़के की इच्छा के दबाव से लाचार होकर सहमति दी थी। यही कारण है कि समु यद्यपि इन लोगों से उम्र में बड़ा है, पर उसकी शादी अनन्य की शादी के बाद ही हुई थी। लिहाजा इरा को तमाम बातों की जानकारी है।

इरा बोली, ''यह बात मैं भली-भांति जानती हूँ। मगर शाश्वती की ओर ताकते ही लगता था कि उसके अन्दर जैसे कोई आग लहक रही हो।''

अरण्य के ममेरे भाई की पत्नी जलकर मर गई है तो भी अरण्य इस सम्बन्ध में हँसी-मजाक करने से बाज नहीं आया। बोल उठा, ''इसके मयिने तुम यह कहना चाहती हो कि जिस जलते हुए स्टोव में उस महिला ने किरोसिन डाला था, वह जनता स्टोव नहीं, बल्कि वह खुद ही थीं।''

इरा बोली, ''कहना कुछ नहीं चाहती हूँ, बाबा, सोच रही हूँ। बीच-बीच में तो मामा के घर जाती ही रहती हूँ। जाने पर लगता, वे लोग दोनों ठीक से एडस्ट नहीं कर पा रहे हैं। जैसे हम गलती कर बैठे हैं, ऐसा ही भाव देखने को मिलता था।''

अरण्य ने कंधे को उचकाकर दोनों हाथ उलटते हुए कहा, ''क्या जाने, तुम लोगों की जो महिमा है वह तुम्हीं लोग जानती हो।''

''सिर्फ हम ही क्यों, जनाब?'' इरा ने कहा, ''मामला तो दोनों व्यक्तियों से जुड़ा हुआ है। नहीं है? बाहर सड़कों पर मुहब्बत कुरते हुए चक्कर काटने से ही क्या कोई हमेशा के लिए एक-दूसरे को समझ पाता है? उस समय तो हवा में सैर-सपाटे करते हैं। हवा की नाव से नीचे उतर, जमीन पर पैर रखते ही हर कदम पर ठोकर लगने लगती है।''

''हुँ। इरावती तो, देख रहा हूँ, बहुत कुछ सोचना जानती हैं।'' इरा ने झुँझलाकर कहा, ''ठीक है, बाबा। खामोश हो जाती हूँ। मैं ठहरी बेवकूफ औरत।''

अरण्य ने कहा, ''अहा, गुस्सा क्यों रही हो? मेरा कहना है- तुम लोगों का तो केले के पेड़ के तले शुभ दृष्टि के साथ ब्याह हुआ था। उसके पहले किसी ने किसी को आँखों से भी नहीं देखा था। संबल था तो बस एक हाफ बस्ट फोटो। था न? मगर इतनी सारी बातों की जानकारी कैसे प्राप्त हुई?''

''औरतें औरतों का चेहरा देखते ही समझ जाती हैं।''

''और मर्द समझ नहीं पाते हैं?''

इरा ही-ही कर हँस देती है। कहती है, ''खाक समझते हैं! मर्द तो रतौंधी किस्म के लोग होते हैं। औरत के मन में क्या है, क्या नहीं है, यह समझने की क्षमता है?''

अरण्य भय का भान करते हुए बोला, ''बेचारा भैया! उसके लिए चिन्ता हो रही है। इतने दिनों से मानता आ रहा था कि उसका भबिष्य सेफ है। पर...''

''बहुत हो चुका। अब नखरा मत करो। जाओ, नहा-धो आओ।''

''यही अच्छा रहेगा। दूसरे के चरखे में तेल है या नहीं, यह सोचने की जरूरत नहीं। बल्कि यह जानना चाहता हूँ कि इस बक्त पानी आया था या नहीं।''

''आया है। तुम लोगों का बैद्यनाथ ठीक कर गया है। उसी वक्त। गीता से खबर भेजी थी।''

''ऐसी बात है? एकाएक इतनी सुमित कैसे आ गई? दस बार बुलाने के लिए न जाने पर...''

इरा मुसकराकर बोली, ''गीता की स्पेशल खातिर करता है। पानी न आने से उसे तकलीफ होती है।''

' 'उफ! तुम लोग यानी औरतें इतना समझती नहीं हो। अच्छा, आ रहा हूँ। मगर कुछ भी नहीं खाऊँगा।''

''अहा, जैसे हर रोज खूब अधिक खाते हो। अच्छा, ऐ सुनो। तुम्हें क्या लगता है, भाई? शाश्वती-दी की जान बच सकती है?

''कैसे बताऊँ? कैसी हालत है, यह क्योंकर बताऊँ?''

''सुरेश बाबू की लड़की ने कहा, सिनथेटिक साड़ी पहनना ही खतरनाक साबित हुआ है। बहुत जल गई है। अन्यथा मत लेना, भाई, मेरी राय में जिन्दा न रहना ही बेहतर होगा, क्योंकि किसी औरत के लिए अधजला एक बीभत्स चेहरा लिये जिन्दा रहना...'' इरा मानो सिहर उठी।

यानी उस दृश्य के बारे में सोचकर इरा भय से सिहर रही है।

अरण्य बाथरूम के दरवाजे तक गया और गरदन घुमाकर बोला, ''सिर्फ एक औरत के लिए ही यह बात लागू होती है, मर्द के लिए नहीं?''

''वाह! मर्द देह पर किरोसिन छिड़ककर मरने जाता है?''  

''जाता नहीं है?''

''जाएगा ही क्यों? वे लोग क्या औरतों की तरह निरुपाय हैं? उन लोगों की ऐसी मानसिक हालत हो तो फिर रेल लाइन नहीं है

क्या? दौड़ती हुई लॉरी नहीं है? दो मंजिला बस नहीं है? और भी कितना कुछ है उनकेपास।''

बहुत ही उत्तेजित दिख रही है इरा; जैसे पुरुषवर्ग के हाथ में आत्महत्या के विविध उपायों का रहना उनके लिए परम ऐश्वर्य की बात हो।

यह औरत खासी बेवकूफ किस्म की है, इसलिए जरा अधिक आवेश में आ जाती है। सो रहे, लेकिन उसके प्रति अरण्य के दिल में काफी ममता और प्यार है। उसे फिलहाल शान्त करने के खयाल से हँसते हुए बोला, ''मगर सोचकर देखो, वे लोग वगैर कोई खर्च किए किस तरह अपना काम निबटा सकते हैं। दुर्लभ दुष्प्राप्य किरोसिन-बर्बाद नहीं करते।''

''उफ! छोटे साहब, तुम किस तरह के हो! स्त्री के प्राणों से बढ़कर तुम्हारा किरोसिन ही है।''

''मैं तो एक पाखंड हूँ, यह तो जानती ही हो।'' यह कहकर इतनी देर बाद स्नानघर में घुस दरवाजा बन्द कर लिया।

इरा ने चिल्लाकर कहा, ''ज्यादा देर मत करना। मुझे डर लगने लगेगा, छोटे साहब।''

भय क्या एक संक्रामक वस्तु है?

यदि नहीं है तो दरवाजा बन्द करते ही अरण्य के रोंगटे एकाएक क्यों खड़े हो जाते?

विदुषी स्त्रियों में भी विश्वास देखने को नहीं मिलता है। कितनी ही दिशाओं में बहुत सारे दरवाजे खुले हुए रहने के बावजूद वे भी मुक्ति के लिए यही एक दरवाजा देख पाती हैं। गले में फंदा लगाकर झूल जाना, देह में किरोसिन तेल छिड़क लेना।

अवंती के घर में क्या 'जनता स्टोव' के मानिन्द एक मामूली गहस्थ के घर में उपयोग में लायी जाने वाली वस्तु का ही उपयोग किया जाता है? उसके घर में निसंदेह आधुनिक से आधुनिक विविध प्रकार की सामग्रियाँ हैं। उनमें किरोसिन की जरूरत नहीं पड़ती।

अलबत्ता अवंती की उस रानी-महारानी जैसी भाव-भंगिमा से अरण्य की इस दुश्चिन्ता का कोई तालमेल नहीं है। फिर भी क्यों अरण्य के सामने आग का एक दृश्य उभरकर चला आता है! उस आग की लपटों की हर फाँक में एक मुखड़े का आभास, एक लम्बी गढ़न की सुपुष्ट वाँह। करवट लेकर सोयी हालत में गाल के समीप कान का निचला हिस्सा।

हालाँकि अरण्य संवेदनशीलता नामक शब्द को हेय दृष्टि से देखता है।

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