चैत की दोपहर में - आशापूर्णा देवी Chait Ki Dopahar Mein - Hindi book by - Ashapurna Devi
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चैत की दोपहर में

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : सन्मार्ग प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :88
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15407
आईएसबीएन :0000000000

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चैत की दोपहर में नारी की ईर्ष्या भावना, अधिकार लिप्सा तथा नैसर्गिक संवेदना का चित्रण है।...

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अवंती के आज के अभियान को क्या एक ही बात में समझाया जा सकता है? जिनके साथ सारा दिन रही, वे लोग कौन थे?

स्वयं को पूरे तौर पर उन्मुक्त कर फव्वारे को पूरी तरह खोल अवंती उसके नीचे बड़ी रही। पानी की धारा तीव्र गति से माथे पर गिर रही है, आस-पास का हिस्सा पानी से भर गया है। फिर भी अवंती उसे कम नहीं कर रही है। ठीक इसी वक्त एक तेज बारिश के दौरान, सड़क पर उतर भीगने की जरूरत थी उसके लिए।

बाहर शीशे की खिड़की के पार आँधी चल रही है, बन्द कमरे में उस आँधी की आवाज रेलगाड़ी चलने की आवाज जैसी लग रही है।

अवंती उस हवा में रेलगाड़ी पर चढ़कर बैठी है और चलती रेलगाड़ी की खिड़की से, हर पल ओझल होती हुई टुकड़ा-दर-टुकड़ा चित्र देख रही है।

चित्र क्या है? पेड़-पौधे? झोंपड़े? चाय के खेत? पहाड़ या अरण्य या नदी?

नहीं, यह सब कुछ भी नहीं। देख रही है कॉलेज के क्लासरूम, चबूतरा, लाइब्रेरी, अड्डा, सोशल.... 'कच-देवयानी' की आवृत्ति, किसी एक स्थान पर आमने-सामने दो कुर्सियों पर बैठे लड़का-लड़की चाय की प्याली सामने ले...उसके बाद गंगा की धारा, अथाह पानी का जमाव, शोर-शराबा, लंच पर सुन्दरवन...शेर-घड़ियाल न देख पाने का अफसोस और कितना कुछ।

सिर पर अविराम जलधारा गिरने से क्या समय की चेतना लुप्त हो जाती है? स्थिति की चेतना भी?

कँपकँपी आ जाते ही एकाएक चेतना लौट आई।...शायद ठण्ड लग रही थी, इस पर ध्यान नहीं गया था, लेकिन कँपकँपी आते ही ध्यान खिंच गया।

फौरन अलगनी पर रखे काफी लम्बे-चौड़े-मोटे तौलिए को खींच लिया अवंती ने। रगड़-रगड़ कर घिसे बिना कँपकँपी दूर नहीं होगी।

शरीर को बिलकुल उन्मुक्त कर, पानी के नीचे डाल, स्निग्ध करनें के लिए यही बाथरूम ही एक जगह होती है। चाहे जिसका बाथरूम जैसा भी हो, चाहे राजसी हो या दीन-हीन हो, फिर भी वह वैसी जगह है।

लेकिन मन को? मन को इसी प्रकार उन्मुक्त कर पसार देने के निमित्त कहीं कोई स्थान नहीं है। उसे एक पिंजरे में कसकर चारों तरफ से बाँध रखवाली करनी पड़ती है।

हालांकि बाहर आँधी चलती है, हवा में रेलगाड़ी पर चढ़ दूर-दूरान्त के रास्ते पर तेज रफ्तार से जाने की इच्छा होती है।

इस ओर आने पर, खाने की मेज का दृश्य देख, अवंती लज्जित हो उठी। दो व्यक्तियों के लिए खाना परोसा गया है। इसके मायने टूटू ने अब भी खाना नहीं खाया है। छि-छि:!

देखा, इस ओर सोफे पर टूटू एक रंग-बिरंगी तसवीरों वाली अंग्रेजी पत्रिका के पृष्ठ उलट-पुलट रहा है, निरर्थक अन्य मनस्कता के साथ-जिस तरह कि डॉक्टर के चैम्बर में अपेक्षारत रोगी उलटते- पलटते रहते हैं।

अवंती ने अब महसूस किया कि टूटू को वह अपेक्षाकृत अधिक पीड़ित कर चुकी है। ममता भी जगी। लोकनाथ के प्रति भी ममता जगी। बेचारा! उसी को तो पहले टूटू मित्तिर के रोष की अग्नि के समक्ष खड़ा होना पड़ा है। खैर, अब किया ही क्या जा सकता है!

अवंती लपककर पति के पास आई, बोली, ''इस्स! तुमने अब तक खाना नहीं खाया है? कितने आश्चर्य की बात है! लोकनाथ-दा कैसे आदमी हैं। तुम्हें खिलाने के लिए बिठा देना चाहिए था।''

कितना कुण्ठाहीन हाव-भाव है? आश्चर्य! औरतें ही इस तरह कर सकती हैं।

लोकनाथ जान-सुनकर ही आसपास नहीं है। अंतराल से उत्तर भी नहीं दिया।

अवंती ने कहा, ''अच्छा तुमसे कहती हूँ...मेरे आने के बाद तो चिन्ता दूर हो गई थी। तुम तो खाना खा ले सकते थे। पूरा दिन नर्सिंग-होम में बिताने की वजह से मुझे इतनी गरमी लग रही थी, वगैर नहाए-धोए...काफी देर भी हो गई। सिर्फ बदन पर पानी डालती रही।''

नर्सिंग-होम! वहाँ किस सिलसिले में जा सकती है!

टूटू संभवत: एक बार और बरसने के लिए तैयार हो रहा था, पर परिस्थिति अटपटी-जैसी हो गई। आँखों की कोर में एक सवाल उठाकर बोला-

''र्नासग-होम!''

अवंती बोली, ''बात तो यही है।''

अब अवंती को हवा की रेलगाड़ी से उतर प्लेटफार्म पर खड़ा होना होगा। अब सरो-सामान सहेज घर लौटना होगा। रेलगाड़ी हमेशा जगह नहीं देती है।

लिहाजा अवंती आत्म-समर्पिता हो गई। और भी करीब आ टूटू के हाथ से पत्रिका हटाकर कोमल स्वर में बोली, ''चलो, खाना खा लें। लेटे-लेटे दिन-भर के अभियान की दास्तान बताऊँगी।''

इसका मतलब अपने आपको बहुत कुछ घटाना होगा!

उपाय ही क्या है! यही तो नारियों की नियति है। 'मनी' और मन-इन्हीं दो की कीमत से जिन्दगी खरीदी जाती है-वह जिन्दगी जिसे देखकर दूसरों को रश्क होता है।

पूरे तीन वर्ष तो इसी तरह बिताती चली आ रही है अवंती नामक युवती, लेकिन कभी इस तरह हिसाब करने बैठी नहीं थी किं किस कीमत पर क्या प्राप्त हो रहा है।

उन तीन बरसों के पहले भी एक युवक ने एक युवती से कहा था, ''कितनी एब्सर्ड बात है! मैं तुम्हारे पिता के पास जाऊँ? उसके बाद? कुत्ते को ललकार दे तो?''

और उसके बाद कहा था, ''इन्तजार? जो युवती राज-सिंहासन के लिए बनी है, वह एक बेकार अभागे कंगाल के लिए इन्तजार करेगी? दिमाग खराब है या पागल हो गई हो?''

और उसके बाद?

उसके बाद वह युवक लापता हो गया, फरार हो गया। बहुत दिनों तक उसका अता-पता ही नहीं चला। उसके बाद सुनने को मिला, उसका पता चल गया है। वैसी कोई अहम बात नहीं थी। कहीं एक कोलियारी में किसी मित्र के यहाँ पडा हुआ था। क्यों? यों ही।

इस बीच मंच पर यवनिका-पात हो गया है।

अरण्य बाघायतीन में बस से उतरा और लम्बे डग भरता हुआ जब घर के सामने आया तो देखा, अनन्य दरवाजे के सामने सड़क पर खड़ा है।

भैया अब भी सड़क पर है!

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