प्यार का चेहरा - आशापूर्णा देवी Pyar Ka Chehara - Hindi book by - Ashapurna Devi
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प्यार का चेहरा

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : सन्मार्ग प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :102
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 15403
आईएसबीएन :000

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नारी के जीवन पर केन्द्रित उपन्यास....

31

कटोरा चिनु के हाथ में थमाते हुए बोली, “मेरे दोनों दूल्हे कहां हैं?" (नाती को मजाक में दूल्हा कहा।)

चिनु हंस दी और बोली, “मुझे भी मालूम नहीं। इतना सारा लेकर क्या करूंगी, बुआ?

“और क्या होगा? मां और बेटे मिलकर खाना। जब से वे छोकरे आए हैं, सोच रही हूं, अपने हाथ से थोड़ा-सा खाना पकाकर ले जाऊं, मगर यह हो नहीं पा रहा है। होगा कैसे, अधिक दूध मांगने से ग्वाला दे नहीं पाता है। फूलझांटी में भी अब दूध का अकाल पड़ गया है। किसी जमाने में हम लोग मां से छिपाकर गिलास-दर-गिलास दूध पेड़ की जड़ में डाल देते थे। और चेहरे पर भोलापन लिये कहते-‘सारा दूध पी गए हैं। अब दुधमुंहे बच्चे तक को दूध नहीं मिलता। अपने जीवन-काल में ही इस फूलझांटी में कितना-कुछ परिवर्तन देख लिया।...बहरहाल, उन बातों को छेड़ा जाए तो लंबी दास्तान हो जाएगी। हां, तो मेरे दोनों दूल्हे कहां गए?"

चिनु हंस दी और बोली, “दोनों दूल्हे? मुझे दो लड़के हैं और दुल्हन सिर्फ एक?"

"इससे क्या आता-जाता है? रात-दिन तो तेरी मां महाभारत ही पढ़ती रहती है, उसमें ही इसका उदाहरण मिल जाएगा।"

चिनु हंसने लगती है।

कहती है, "दोनों में से एक भी घर पर नहीं है। आने के बाद से दोनों अकसर बाहर का ही चक्कर काटते रहते हैं। आने के पहले

गांव के नाम पर कितना डरते थे और आने पर देख रही हूं"...

"हूं ! यह फूलझांटी की माटी का गुण है री, चिनु। यहां की जमीन पर पैर रखते ही प्यार उमग आता है।"

चिनु हंसकर कहती है, “अब वैसी बात कह रही? तमाम मकान सूने हो गए हैं। जितनी भी बहुएं थीं, भाग खड़ी हुईं। ज्यादातर मकानों में एक-दो बूढ़ा-बूढ़ी पुश्तैनी मकान की रखवाली कर रहे हैं। इसके अलावा कुछेक लोग हैं जो डेली पैसेंजरी कर यहां घर-संसार बसाए हुए हैं।"

पटेश्वरी एक लंबी सांस लेकर कहती हैं, "तू ठीक ही कह रही है। देस में कितनी गहमा-गहमी थी ! घर-घर में बखार, गोला, खटाल, गाय:.''

एकाएक हंसने लगती हैं।

कहती हैं, “कहावत है न, हे कन्हैया, कितने ही खेल दिखाये तूने। सो म साधक काली खेल दिखा रही हैं। मां के दर्शन करने गई थी, चिनु?"

“कहां संभव हो सका।"

चिनु कहती है, "तुम किसी दिन वक्त निकालकर ले चलो।"

"हां, चलेंगी। तेरी मां तो अलग किस्म की है। न हिन्दू, न ईसाई। एक तरफ तो आचार-विचार, पूजा-पाठ, रामायण-महाभारत सब कुछ है, लेकिन मंदिर की तरफ कदम ही नहीं बढ़ाती। घर को चौखट के पार भी जाना नहीं चाहती। चलूंगी, मैं ही अपने साथ ले चलेंगी। कुछ दिन रुकना है न?”

"मैं इस महीने के आखिर तक रहूंगी। बड़ा लड़का कल चला जाएगा।"

"लो ! कल जा रही है? भाग्य अच्छा था कि खाने की यह सामग्री आज ले आयी। हां, पहले क्यों जा रहा है?"

“कुछ मत पूछो, बुआ ! वह बड़ा ही जिद्दी लड़का है। जाऊंगा कहा तो हर हालत में जाएगा ही। अभी परीक्षा की धुन सवार हो, गयी है सिर पर। मुंहजली परीक्षा भी वैसी ही है। दो महीने से लटकाए हुए है। पहले कभी ऐसा नहीं देखा था। सब बिलकुल सूरज-चांद के नियम जैसा था।”

“अब सब कुछ बदल रहा है। सब कुछ उल्टा-पुल्टा हो गया है। गनीमत यही है कि अब भी आदमी पैर ऊपर की ओर और सिर नीचे की तरफ किए नहीं चल रहे हैं। कुछ दिन और जिन्दा रही तो हो सकता है यह भी देखकर जाऊं। तुम लोगों के शह-बाजार में सुना है। हिप्पी या चिप्पी कुछ ऐसा ही हैं। वे लोग ही यह फैशन ले आएंगे।"

चिनु हंसती जा रही है।

कहती हैं, “पटाई बुआ एक ही बात दुहराती रहती है।”

पटेश्वरी आंचल हिला हिलाकर हवा खाते हुए कहती है, "यूही कहती हूं क्या? देख-सुनकर प्राण-पंछी फूट-फूटकर रोता है।''अरे हां, झट से तुझे एक बात कहे जाती हूं, चिनु। सुनकर देह पर तू राख फेंकेगी तो वह राख बगैर झाड़े-पोंछे ही चली जाऊंगी।”

चिनु संदेड़ भरी निगाह से ताकती है।

पटेश्वरी आंचल हिलाते-हिलाते कहती है, तो फिर कह ही दूं-कहना यही है कि अब तो सारा कुछ उल्टा-पुल्टा चल रहा है। तुम लोगों के कलकत्ता में, सुनने को मिला है, अब जात-पांत का विचार नहीं किया जाता। ब्राह्मण-कायस्थ तो दूर की बात, मेहतर-बाग्दी में शादी-ब्याह चल रहा है। सो तू भी क्यों न एक कायस्थ की लड़की अपने घर में ले जा सकती है? बड़े लड़के की शादी कुछ दिनों में करनी ही हैं।"

चिनु अवाक् होकर ताकती है।

"प्रवाल की शादी की बात कह रही हो?”

"नहीं तो क्या दूसरे की? पर हां, आज ही करने को नहीं कह रही हूं। कह-सुनकर रखती।"

चिनु एक लंबी सांस लेती है।

चिनु कहती है, “लतू के बारे में कह रही हो?”

"खैर, समझी तो सहीं।"

चिनु आहिस्ता से सिर हिलाती है, इसके लिए तुम्हारा जमाई

राजी होगा?"

"नहीं होगा? क्यों, जमाई क्या बेहद कट्टरपंथी है?”

"नहीं नहीं, ऐसी बात नहीं।"

पटेश्वरी कहती हैं, "समझ गई। अब कहने की जरूरत नहीं। कुछ और ही बात है। वह बड़ी ही भलो लड़की है, चिनु ! तेरे लड़के को गुण-दोष मैं नहीं जानतीः तेरे बारे में ही सोचकर मैं कह रही थी न मालूम कहां किसके घर जाना पड़ेगा, किसके शासन के तले पिसी जाएगी। तेरी जैसी सास क्या मिल सकेगी?”

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