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हमारे पूज्य देवी-देवता

स्वामी अवधेशानन्द गिरि

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2013
पृष्ठ :207
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 15402
आईएसबीएन :9788131010860

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’देवता’ का अर्थ दिव्य गुणों से संपन्न महान व्यक्तित्वों से है। जो सदा, बिना किसी अपेक्षा के सभी को देता है, उसे भी ’देवता’ कहा जाता है...

कुल देवता


जैसे शरीर में आत्मा के रहने तक शरीर का अस्तित्व है और आत्मा के निकलने पर शरीर का अस्तित्व नहीं रहता, वैसे ही प्रत्येक वस्तु का अस्तित्व उसके अधिष्ठाता (देवता) से है। अधिष्ठाता के बिना वस्तु का कोई अस्तित्व नहीं रहता। 'श्रीरामचरित मानस' के अनुसार शरीर में आंख, कान, नाक आदि इंद्रियों के देवता होते हैं। ये इंद्रियां उनसे ही संचालित हैं।

विभिन्न शास्त्रों में देवताओं की संख्या तेंतीस करोड़ बताई गई है। उनमें से तेंतीस देवता ही मुख्य माने गए हैं। लेकिन शास्त्रों का यह भी आदेश है कि अपने इष्ट देवता के साथ-साथ अपने नगर देवता, ग्राम देवता, स्थान देवता और कुल देवता की भी यथासमय पूजा करनी चाहिए।

देवता अशुभ एवं हानिकारक वस्तुओं से हमारी रक्षा करते हैं और हमारी मनोकामना पूरी करते हैं। जैसे नगर देवता नगर की, ग्राम देवता ग्राम की और स्थानीय देवता स्थान की रक्षा करते हैं, वैसे ही कुल देवता हमारे कुल की रक्षा करते हैं। प्रत्येक हिंदू परिवार के अपने-अपने कुल देवता होते हैं। अपने कुल की रक्षा और सुख-समृद्धि के लिए कुल देवता की पूजा करने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। कुल देवता के प्रति भक्ति भाव रखने और उनकी पूजा करने से वे प्रसन्न होते हैं। त्रेता युग में भगवान श्रीराम भी परंपरानुसार अपने कुल देवता रंगनाथ की पूजा करते थे।

'वाल्मीकि रामायण के अनुसार सम्राट रावण की लंका नगरी की अधिष्ठात्री (देवी) लंकिनी थी। वह लंकापुरी की रक्षा करती थी। उसके रहते लंका में कोई परिंदा भी पर नहीं मार सकता था। रावण अपनी कुलदेवी निकुंभिला की भी पूजा करता था। संत रामानुज भी अपने कुल देवता की पूजा किया करते थे। इन सबको यह विश्वास था कि कुलदेवता हमारी रक्षा करेंगे।

इसी विश्वास के साथ और कुल परंपरा के अनुसार अपने-अपने कुल देवता की पूजा करना हितकारी माना जाता है। किंतु अपने कुल के देवता कौन हैं-यह तो कुल के बुजुर्ग व्यक्ति ही बता सकते हैं। यदि किसी को अपने कुल देवता के विषय में पता न हो तो वह मालूम करे कि उसके परिवार का मूल विकास कहां से है, यानी उसके परिवार का मूल निवास कहां था। जिन्हें अपने कुल देवता का पता न हो, उन्हें कुल देवता के स्थान पर अपने माता-पिता की पूजा करनी चाहिए। जिन्हें अपने कुल देवता का पता है किंतु वे अपने परिवार से दूर हैं और किसी कारणवश अपने कुल देवता की पूजा करने के लिए गांव नहीं जा सकते; उनके लिए एक उपाय यह है कि वे अपनी बहन के लड़के यानी भानजे को पांच कपड़े दे दें। यह भी कुल देवता की पूजा के समान है।

सामर्थ्यवान लोग अपने कुल देवता की पूजा करने के लिए मंदिर बनवाते हैं और विवाह आदि अवसरों पर वे वहां जाकर अपने कुल देवता की पूजा करते हैं। जो लोग असमर्थ होते हैं, वे अपने घरों में कुल देवता का छोटा सा मंदिर बना लेते हैं और समय-समय पर कुल देवता की पूजा करते रहते हैं। हर व्यक्ति को अपने परिवार की रक्षा और सुख-समृद्धि के लिए अपने कुल देवता की पूजा अवश्य करनी चाहिए।


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