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हमारे पूज्य देवी-देवता

स्वामी अवधेशानन्द गिरि

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2013
पृष्ठ :207
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 15402
आईएसबीएन :9788131010860

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’देवता’ का अर्थ दिव्य गुणों से संपन्न महान व्यक्तित्वों से है। जो सदा, बिना किसी अपेक्षा के सभी को देता है, उसे भी ’देवता’ कहा जाता है...

दत्तात्रेय


भगवान दत्तात्रेय श्री विष्णु के चौबीस अवतारों में से एक प्रमुख अवतार माने गए हैं। उत्तर भारत में श्री दत्तात्रेय की इतनी प्रसिद्धि और महिमा नहीं है, जितनी दक्षिण भारत में है-विशेष रूप से महाराष्ट्र में श्री दत्तात्रेय की बड़ी ख्याति है। वहां के हिंदू परिवारों में अनेक नाम ऐसे मिलेंगे जिनमें किसी न किसी रूप में 'दत्तात्रेय' अवश्य जुड़ा हुआ दिखेगा।

श्री विष्णु के अवतार प्रायः अपने आपमें अत्यंत विचित्र, चमत्कारी और अनूठे रहे हैं। दत्तात्रेय के रूप में भी उनका यह अवतार सबसे अलग ही है। विष्णु के परम तेजस्वी अंश ने अत्रि और अनुसूया के गर्भ से जन्म लिया था। अनुसूया महासती थीं। उनके सतीत्व से पार्वती, सरस्वती और लक्ष्मी के सतीत्व को भी चुनौती मिली थी। तब उन तीनों ने अपने-अपने पतियों - शिव, ब्रह्मा तथा विष्णु से कहा कि वे जाकर अनुसूया के सतीत्व को भंग करें और इस प्रकार अपनी पत्नियों की मर्यादा बढ़ाएं।

तीनों देव भिक्षुक के रूप में अनुसूया के पास गए और भोजन मांगा। उन्होंने मांग की कि भोजन की शुद्धता के लिए अनुसूया निर्वस्त्र होकर खाना परोसें। इससे निश्चित ही अनुसूया का सतीत्व खंडित हो जाता। अनुसूया ने इस छल को समझ लिया और उन्होंने अपने तपोबल से तीनों देवताओं को बालकरूप में कर दिया। फिर उन्होंने निर्वस्त्र होकर उन्हें भोजन कराया।

मातृ रूप में अनुसूया को पाकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश आनंदित हो गए। फिर वे बहुत काल तक चित्रकूट में अनुसूया और अत्रि के आश्रम में बालकरूप में रहे। लक्ष्मी, पार्वती और सरस्वती ने जब बहुत तरह से अपने अपराध के लिए क्षमा मांगी तब अनुसूया ने उनके पतियों को उस रूप से मुक्ति दी। तभी अनुसूया को यह वर मिला कि वे तीनों देवता ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश-अनुसूया के गर्भ से जन्म लेंगे और पुत्र-रूप में उन्हें सचमुच प्राप्त होंगे।

कालांतर में यही तीनों शक्तियां अपने-अपने अंशों के साथ अनुसूया के गर्भ से जन्म लेकर पृथ्वी पर आईं। ब्रह्मा के तेज से सबसे पहले सोम अर्थात चंद्रमा का जन्म हुआ। उसकी कीर्ति दसों दिशाओं में फैली। उसने विश्व को शीतलता और चांदनी दी। विष्णु के तेज से अनुसूया ने जो गर्भ बीज धारण किया, वह दत्तात्रेय के रूप में प्रकट हुआ। इस पुत्र के तीन मुख थे। वे तीनों मुख ब्रह्मा, विष्णु और महेश का भी प्रतिनिधित्व करते थे।

सती अनुसूया के तीसरे पुत्र थे- दुर्वासा। वे साक्षात रुद्र के तेज से उद्भूत थे और क्रोध के अवतार थे। दुर्वासा महर्षि थे। उनकी कठिन तपस्या और उनके क्रोध की अनेक कथाएं प्रचलित हैं। हैहयराज कृतवीर्य ने दुर्वासा के गर्भ में रहते ही एक बार अत्रि ऋषि का बड़ा अपमान कर दिया। इससे अत्यंत क्रोधित होकर दुर्वासा सात दिनों में ही माता अनुसूया के उदर से बाहर निकल आए और उस राजा को भस्म करने पर उद्यत हो गए थे।

श्री दत्तात्रेय ने कठिन तपस्या और योग का मार्ग अपनाया। उन्होंने पेड़-पल्लव से लेकर कुत्ते-बिल्ली तक को अपना गुरु बनाया। उनका कहना था कि परमात्मा ने हर जीव में अपना कुछ अंश भर दिया है जिनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता है। यदि सभी स्थलों पर इस प्रकार केवल गुण ही बटोरे जाएं तो मानव सारे गुणों की खान बन सकता है। उन्होंने अपने तप से 'भगवान दत्तात्रेय' का पद प्राप्त किया। उनकी शक्ति से देवता भी उनके आगे झुकते थे। जब जृंभ दैत्य ने इंद्र तथा समस्त देवगणों के छक्के छुड़ा दिए तो ब्रह्मा ने उन्हें सलाह दी कि दत्तात्रेय के पास जाकर इस विपत्ति से छुटकारा पाने का उपाय पूछे।

देवताओं ने दत्तात्रेय के पास जाकर सह्याद्रि पर्वत की गुफा में उनकी बड़ी सेवा और पूजा की। तब उन्होंने देवताओं को जृंभ दैत्य पर विजय पाने का वर दिया। यह तरकीब बताई कि वे राक्षसों से लड़ते हुए उन्हें यहां तक ले आएं ताकि वे लक्ष्मी को देखकर मुग्ध हो जाएं। हुआ भी यही दैत्यों ने जब देवताओं को मारना प्रारंभ किया तो वे भागकर दत्तात्रेय के पास जा छिपे। दैत्य भी पीछा करते-करते उधर जा पहुंचे। वहां उन्होंने दत्तात्रेय के पास लक्ष्मी को देखा तो उस पर मुग्ध होकर उसे ले भागे। तब दत्तात्रेय ने देवताओं से कहा, “अब लक्ष्मी इनके सिर पर चढ़ गई है। अब फिर से युद्ध करो। इनका पुण्य क्षय हो गया है। ये अवश्य हारेंगे।'' तब इंद्र आदि देवताओं ने उन दैत्यों का संहार किया। और लक्ष्मी को वापस लाकर दत्तात्रेय के पास प्रतिष्ठित किया।

दत्तात्रेय की महिमा त्रैलोक्य में छा गई। ऐसे में राजा कार्तवीर्य महामुनि भगवान दत्तात्रेय के पास अपनी प्रजा का पालन करने और अधर्म से बचने के लिए वर मांगने पहुंचा। राजा की सेवा से प्रसन्न होकर दत्तात्रेय ने वर दिया कि उसे हजार भुजाएं प्राप्त हों। वह आकाश, पाताल और पृथ्वी पर समान गति से आ-जा सके। यदि उसका वध हो तो केवल उसी से जो सर्वश्रेष्ठ हो। राजा द्वारा स्मरण करने से ही संपूर्ण राज्य में अभाव दूर हो जाए।

भगवान दत्तात्रेय के आशीर्वाद से राजा कीर्तवीर्य सहस्रबाहु हुआ। उसकी इच्छाएं पूरी हुईं। तब उसका संपूर्ण राज्याभिषेक हुआ। इसी प्रकार नागकुमारों के राजकुमार अलर्क को भी भगवान दत्तात्रेय ने योग की शिक्षा दी और कहा, “ममता का अभाव रखने वाले लोग ही सच्चा सुख पाते हैं। इसके अतिरिक्त जहां रहना हो, उसे ही घर समझो; जिससे जीवन चलता रहे, वही भोजन है और जिस बात से बंधन मुक्ति हो, वही सच्चा ज्ञान है।"

इसके बाद भगवान दत्तात्रेय ने दक्षिण के धनुषकोटि नामक तीर्थ मं  अपना स्थान ले लिया। उस क्षेत्र में पहुंचकर स्नान करने वाले व्यक्ति अनेक पापों से मुक्ति पा जाते हैं। इसीलिए धनुषकोटि को चौबीस तीर्थों में से एक विख्यात तीर्थ माना गया है।

अपने देश में ऐसे भी संप्रदाय हैं जो केवल दत्तात्रेय की पूजा करते हैं।

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