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हमारे पूज्य देवी-देवता

स्वामी अवधेशानन्द गिरि

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2013
पृष्ठ :207
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 15402
आईएसबीएन :9788131010860

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’देवता’ का अर्थ दिव्य गुणों से संपन्न महान व्यक्तित्वों से है। जो सदा, बिना किसी अपेक्षा के सभी को देता है, उसे भी ’देवता’ कहा जाता है...

देवता खण्ड


धर्म ग्रंथों में त्रिदेवों को ही विशेष महत्ता प्राप्त है। इनमें भी श्री विष्णु और भगवान शिव के अवतारों का वर्णन अलग-अलग पुराणों में आता है। श्री विष्णु सृष्टि के पालनकर्ता हैं, इसलिए जब भी संसार में आसुरी वृत्तियां बढ़ती हैं, तभी वे सज्जनों की रक्षा के लिए अवतार लेते हैं। यह इनकी मनुष्य रूप लीला होती है। अपने उद्देश्य की पूर्ति के बाद अर्थात धर्म का पुनस्र्थापन करके ये अपनी लीला समेट लेते हैं। देवताओं और दिव्य पुरुषों का संबंध प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से इन त्रिदेवों के साथ ही होता है।

प्रकृति में संतुलन और इसके कार्यों को पूरा करने के लिए जो चेतन तत्व कार्य कर रहे हैं, उन्हें भी देव श्रेणी में मान्यता प्राप्त है। हिंदू धर्म शास्त्रों में उनके गुण और कार्यों के अनुसार ऐसे व्यक्तित्व की कल्पना की गई है जिसे देखते ही उस तत्व की अनुभूति हो। उनसे जुड़ी कथाओं के अनुसार भी उनका चित्रांकन किया गया है। उपासना में इन देवताओं का प्रतीकों के रूप में उपयोग किया जाता है। इस भावना का लाभ भी होता है। देवो भूवा देवं यजेत् अर्थात देवता बनकर ही देवता की आराधना करो। इससे सिद्ध उपासक में देवत्व की भावना जाग्रत होती है।

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