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हमारे पूज्य देवी-देवता

स्वामी अवधेशानन्द गिरि

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2013
पृष्ठ :207
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 15402
आईएसबीएन :9788131010860

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’देवता’ का अर्थ दिव्य गुणों से संपन्न महान व्यक्तित्वों से है। जो सदा, बिना किसी अपेक्षा के सभी को देता है, उसे भी ’देवता’ कहा जाता है...

कूष्मांडा

मां दुर्गा के चौथे स्वरूप का नाम 'कूष्मांडा' है। अपनी मंद मुस्कान द्वारा अंड अर्थात संपूर्ण ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्मांडा देवी' के नाम से अभिहित किया गया है। जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था और चारों ओर अंधकार ही अंधकार परिव्याप्त था तब इन्हीं देवी ने अपने ईषत हास्य से ब्रह्मांड की रचना की थी। अतः यही सृष्टि की आदिस्वरूपा और आदिशक्ति हैं। इनके पूर्व ब्रह्मांड का कोई अस्तित्व ही नहीं था।

मां कूष्मांडा का निवास सूर्यमंडल के भीतरी लोक में है। सूर्यलोक में निवास करने की क्षमता केवल इन्हीं में है। इनके शरीर की कांति सूर्य के समान ही देदीप्यमान और भास्वर है। इनके तेज की तुलना इन्हीं से की जा सकती है।

कोई अन्य देवी-देवता इनके तेज और प्रभाव की समता नहीं कर सकते। इन्हीं के तेज और प्रकाश से दसों दिशाएं प्रकाशित हो रही हैं। इस ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्रणालियों में अवस्थित तेज इन्हीं की छाया है।

कूष्मांडा देवी की आठ भुजाएं हैं, अतः ये अष्टभुजा देवी के नाम से भी विख्यात हैं। इनके सात हाथों में क्रमशः कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा है। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है। इनका वाहन सिंह है। संस्कृत भाषा में कुम्हड़े को ‘कूष्मांड' कहते हैं। बलियों में कुम्हड़े की बलि इन्हें सर्वाधिक प्रिय है। इस कारण भी ये 'कूष्मांडा देवी' कही जाती हैं।

नवरात्र पूजन के चौथे दिन कूष्मांडा देवी के स्वरूप की उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन अनाहत चक्र में अवस्थित होता है। अतः इस दिन उसे अत्यंत पवित्र मन से कूष्मांडा देवी के स्वरूप को ध्यान में रखकर उनका पूजन करना चाहिए। मां कूष्मांडा की साधना-उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक आदि विनष्ट हो जाते हैं। इनकी भक्ति से आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है। मां कूष्मांडा अत्यल्प सेवा और भक्ति से भी प्रसन्न हो जाती हैं। यदि मनुष्य सच्चे हृदय से इनका शरणागत बन जाए तो उसे अत्यंत सुगमता से परमपद की प्राप्ति हो सकती है।

हमें चाहिए कि हम शास्त्रों-पुराणों में वर्णित विधि-विधान के अनुसार मां कूष्मांडा की उपासना और भक्ति के मार्ग पर अहर्निश अग्रसर हों। मां के भक्ति मार्ग पर कुछ ही कदम आगे बढ़ने पर भक्त साधक को उनकी कृपा का सूक्ष्म अनुभव होने लगता है। दुख-स्वरूप यह संसार उसके लिए अत्यंत सुखद और सुगम बन जाता है। मां की उपासना मनुष्य हेतु सहज भाव से भव सागर से पार उतरने के लिए सर्वाधिक सुगम और श्रेयस्कर मार्ग है। मां कूष्मांडा की उपासना मनुष्य को आधि-व्याधियों से सर्वथा विमुक्त करके उसे सुख, समृद्धि और उन्नति की ओर ले जाने वाली है। अतएव अपनी लौकिक और पारलौकिक उन्नति चाहने वालों को इनकी उपासना में सदैव तत्पर रहना चाहिए।

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