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कवि प्रदीप
कवि प्रदीप
प्रकाशक :
भारतीय साहित्य संग्रह |
प्रकाशित वर्ष : 2017 |
पृष्ठ :52
मुखपृष्ठ :
ई-पुस्तक
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पुस्तक क्रमांक : 10543
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आईएसबीएन :9781613016312 |
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राष्ट्रीय चेतना और देशभक्तिपरक गीतों के सर्वश्रेष्ठ रचयिता पं. प्रदीप की संक्षिप्त जीवनी- शब्द संख्या 12 हजार।
‘प्रीत का गीत’ (1950) फिल्म में प्रदीप ने संवाद शैली में भी गीत लिखे। एक झलक-
आशाः मैं हूं पिया नदिया और तुम हो किनारा।
प्रकाशः जनम जनम का सजनी साथ हमारा।
आशाः सूरज को देख हंसी सूरजमुखी।
प्रकाशः देखा तुम्हें हुई अंखियां सुखी।
बाद में आनंद बख्शी ने इसी विधा का सफल प्रयोग करते हुए ‘अच्छा तो हम चलते हैं...’ जैसा संवाद गीत लिखा, जिसने खूब धूम मचाई।
फिल्मिस्तान कंपनी के शषधर मुकर्जी प्रदीप की कलम का जादू जानते थे। अपनी सामाजिक फिल्म ‘नास्तिक’ (1945) के सभी नौ गीत प्रदीप से लिखवाए। सभी गीत लोकप्रिय हुए और फिल्म हिट हो गई। प्रदीप के अंदर बैठे साहित्यकार को मुखर होने और गीतों में नए प्रयोग करने का अवसर मिला। मानव के नैतिक पराभव पर प्रदीप दुखी थे। दुःख में ईश्वर याद आता है। उसी से फरियाद करते हुए लिखा और गाया-
देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान!
कितना बदल गया इनसान।
इस गीत ने लोकप्रियता की बुलंदियों को छुआ। लता जी आमतौर मुजरा नहीं गाती हैं परंतु इस फिल्म के लिए प्रदीप का लिखा मुजरा शालीन था अतः उन्होंने खुशी से गाया-
कैसे आए हैं दिन हाय अंधेर के ।
बैठे बलमा हमारे नजर फेर के ।।
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