अरस्तू - सुधीर निगम Arastu - Hindi book by - Sudhir Nigam
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जीवनी/आत्मकथा >> अरस्तू

अरस्तू

सुधीर निगम


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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :69
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 10541
आईएसबीएन :9781613016299

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सरल शब्दों में महान दार्शनिक की संक्षिप्त जीवनी- मात्र 12 हजार शब्दों में…

अवसान : अरस्तू और सिकंदर

काल के प्रवाह में बहते हुए हम कई शताब्दियां पार कर गए हैं। इस कथा का समाहार करने के लिए हमें पुराने दिनों की ओर लौटना होगा। लीकियम के वे दिन जब अरस्तू का स्कूल अपनी स्थापना के बारहवें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। सिकंदर ने पारसीक राज्यों को ध्वस्त कर दिया है।

अरस्तू फिलिप की मृत्यु के बाद मकदूनिया से वापस आ गया था। लगभग उसी समय सिकंदर ने विश्व विजय अभियान की योजना बना डाली थी और ईसा पूर्व 334 की बसंत में एशिया कोचक में प्रवेश किया था।

सिकंदर अरस्तू का अत्यधिक सम्मान करता था यद्यपि उनके राजनैतिक विचार मेल नहीं खाते थे। अरस्तू छोटे नगर राज्यों का समर्थक था परंतु सिकंदर अपने पिता की तरह साम्राज्यवाद में विश्वास करता था और उससे भी आगे बढ़कर विश्व विजयी बनना चाहता था। अरस्तू यूनानी संस्कृति की श्रेष्ठता का प्रबल समर्थक और विदेशियों के, जिन्हें यूनानी ‘बर्वर’ कहते थे, विरुद्ध था परंतु सिकंदर यूनानी और बर्वरों के बीच भेद को समाप्त करना चाहता था। अपने विजय अभियान के दौरान जिन-जिन देशों से सिकंदर गुजरा वहां की रीति रिवाजों और परंपराओं को सम्मान की दृष्टि से देखा। सिकंदर की उपलब्ध्यिं की सूचनाएं अरस्तू तक पहुंचतीं। उसने कभी किसी उपलब्धि के लिए सिकंदर की प्रशंसा नहीं की। उसका दृष्टिकोण व्यंग्यपूर्ण तटस्थ-सा रहता। सिकंदर के देवत्व धारण करने को उसने कतई पसंद नहीं किया। तथापि अरस्तू ने सिकंदर के लिए एक ग्रंथ प्रशासन की कला और दूसरा औपनिवेशीकरण पर लिखा था। गुरु के प्रति कृतज्ञता स्वरूप सिकंदर ने अपनी सेना में भूगोलवेत्ता, वनस्पतिशास्त्री तथा अन्य अनेक ऐसे वैज्ञानिक सम्मिलित कर लिए थे जो अरस्तू के लिए अध्ययन सामग्री एकत्र करते थे।

सूसा में अपने अधिकारियों का एशियाई देशों की स्त्रियों के साथ एक सामूहिक विवाह का सिकंदर ने आयोजन किया। पारसीक सैनिक अपने सम्राट को पृथ्वी पर झुककर अभिवादन करते थे। इस ‘प्रोस्कीनिसिस’ प्रथा को प्रारंभ करने का आदेश सिकंदर ने अपनी सेना को दिया। यूनानी सैनिक इसके विरुद्ध थे पर इतना साहस किसी में नहीं था कि वह इसका विरोध करता।

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