लोगों की राय

ई-पुस्तकें >> काँच की चूड़ियाँ

काँच की चूड़ियाँ

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :221
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9585
आईएसबीएन :9781613013120

Like this Hindi book 2 पाठकों को प्रिय

241 पाठक हैं

एक सदाबहार रोमांटिक उपन्यास

हां... तब मैं भोली-भाली नादान लड़की थी... गांव की फुलवाड़ी पर नाचने वाली तितली... उस उद्यान की एक कोमल कली थी जिसे तुमने रास्ते का फूल समझ कर पांव से रौंद डाला... बुरा-भला कुछ भी तो ज्ञान न था मुझे... और नीच चाण्डाल! तूने मेरी इज्जत तक छीन ली...''

यह कहते-कहते वह क्षण-भर के लिए रुकी। उसकी आंखें क्रोध से लाल हो रही थीं। यह बदले हुए तेवर देखकर प्रताप का कलेजा धड़का और वह संभल कर बैठ गया। गंगा उसके बिल्कुल समीप आ गई और आँखों से ज्वाला बरसाती हुई बोली, ''वही दफ्तर... वही तू है... मैं भी हूँ... अकेली हूँ; किन्तु अब मैं वह भोली गंगा नहीं... बुरा-भला समझने लगी हूँ... अब मैं वह अबोध लड़की नहीं... औरत हूँ... औरत... ले आज मुझे छू कर देख! तुझ में साहस है तो अब इस औरत पर हाथ उठा... पापी दुष्ट...'' प्रताप घबराकर इधर-उधर देखने लगा। उसके चेहरे का रंग फीका पड़ गया था और वह इस सिंहनी से बचने का उपाय सोच रहा था। गंगा फिर चिल्लाई, ''हां, हां! देखता क्या है... छूकर बता नीच कुत्ते... कहाँ है तेरा साहस...''

काँच की चूड़ियाँ

अनुक्रम

Next...

प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book